मुंबई: महाराष्ट्र प्याज किसान संकट इन दिनों सुर्खियों में है। किसान मंडियों में अपनी उपज लागत से भी कम दाम पर बेचने को मजबूर हैं। इसी बीच सरकार ने गुरुवार को प्याज 24 रुपये प्रति किलो की दर से आम लोगों को उपलब्ध कराने का फैसला लिया। किसानों का कहना है कि इस कदम से उनकी मुश्किलें और बढ़ गई हैं।
सरकार का फैसला और किसानों की नाराजगी
सरकार ने राष्ट्रीय उपभोक्ता सहकारी संघ (NCCF), नेफेड (NAFED) और केंद्रीय भंडार की ओर से प्याज की सस्ती खुदरा बिक्री शुरू की है। मोबाइल वैन के जरिए ग्राहकों को 24 रुपये किलो प्याज दिया जा रहा है। लेकिन किसानों का कहना है कि जब मंडियों में उन्हें पहले ही लागत से कम दाम मिल रहा है, तब यह कदम पूरी तरह किसान विरोधी है।
महाराष्ट्र प्याज किसान संकट क्यों गहराया
महाराष्ट्र के प्याज उत्पादक संगठन का कहना है कि खेती की लागत लगभग 22 से 25 रुपये प्रति किलो आती है। इसके बावजूद मंडियों में किसानों को केवल 6 से 9 रुपये किलो दाम मिल रहा है। यानी उन्हें लागत से चार गुना कम दाम पर प्याज बेचना पड़ रहा है। इससे किसानों की हालत लगातार बिगड़ती जा रही है।
बफर स्टॉक खोलने पर उठे सवाल
किसान संगठनों का आरोप है कि सरकार बफर स्टॉक का इस्तेमाल गलत तरीके से कर रही है। बफर स्टॉक का उद्देश्य केवल उस समय प्याज सप्लाई करना है जब मंडियों में कमी हो या कीमतें अचानक बढ़ जाएं। लेकिन फिलहाल ऐसी स्थिति नहीं है। इसके बावजूद प्याज बाजार में सस्ती दरों पर उतारने का निर्णय किसानों की आमदनी पर चोट है।
ग्राहकों को सस्ती प्याज, किसानों पर बोझ
उपभोक्ताओं को जरूर राहत मिली है, लेकिन किसान लगातार घाटे में जा रहे हैं। किसान संगठनों का कहना है कि सरकार अगर वाकई किसान हितैषी होती तो लागत से नीचे दाम मिलने पर समर्थन मूल्य या सब्सिडी की व्यवस्था करती। महाराष्ट्र प्याज किसान संकट इस बात का सबूत है कि किसानों की मेहनत और लागत के बावजूद उन्हें उचित दाम नहीं मिल पा रहा। सरकार का फैसला जहां उपभोक्ताओं के लिए फायदेमंद है, वहीं किसानों की आर्थिक स्थिति को और कमजोर कर रहा है। अगर ऐसी नीतियां जारी रहीं तो आने वाले समय में किसान प्याज उत्पादन से ही मुंह मोड़ सकते हैं।
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