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हाइब्रिड धान में फॉल्स स्मट से बचाव जरूरी, बूटिंग अवस्था में चूक के गंभीर परिणाम

It is necessary to protect against false smut in hybrid paddy

समस्तीपुर: धान भारत की खाद्य सुरक्षा की आधारशिला है। वर्ष 2025–26 के तीसरे अग्रिम अनुमान के अनुसार देश में चावल उत्पादन रिकॉर्ड 154.024 मिलियन टन तक पहुँच गया। वहीं 14 अगस्त 2026 तक चालू खरीफ मौसम में लगभग 379.07 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में धान की बुवाई हो चुकी थी। इतने बड़े उत्पादन आधार में बाली और दानों को प्रभावित करने वाले रोगों की समय पर रोकथाम अत्यंत महत्वपूर्ण है। इन्हीं रोगों में फॉल्स स्मट यानी आभासी कंडुआ तेजी से चिंता का विषय बन रहा है।

कभी शुभ माना जाता था, अब बन गया गंभीर रोग

फॉल्स स्मट को कई क्षेत्रों में हल्दी गांठ रोग, आभासी कंडुआ या लक्ष्मीनिया रोग भी कहा जाता है। पहले इसका छिटपुट प्रकोप अधिक उपज वाली फसल से जुड़ा होने के कारण किसान इसे कभी-कभी शुभ संकेत तक मान लेते थे। लेकिन उच्च उपज देने वाली, उर्वरक-संवेदी किस्मों और कई संकरों की बढ़ती खेती, नाइट्रोजन का अधिक प्रयोग तथा अनुकूल मौसम के कारण यह अब प्रमुख रोग के रूप में उभरा है।

वर्ष 2026 में प्रकाशित नवीन समीक्षा के अनुसार भारत में विभिन्न स्थानों और वर्षों में फॉल्स स्मट का रोग-प्रकोप 5 से 85 प्रतिशत तथा उपज-हानि 0.2 से 49 प्रतिशत तक दर्ज की गई है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर खेत में इतनी हानि होगी; वास्तविक नुकसान किस्म, मौसम, संक्रमण की तीव्रता और संक्रमित बालियों की संख्या पर निर्भर करता है। भारतीय किस्मों पर किए गए एक अन्य अध्ययन में उपज हानि 0.7–8.6 प्रतिशत के बीच रही, साथ ही मिलिंग, पकाने और दाने की गुणवत्ता भी प्रभावित हुई।

रोग का वास्तविक कारण क्या है?

यह रोग मुख्यतः कवक यूस्टिलागिनोइडिया विरेन्स (Ustilaginoidea virens) के कारण होता है, जिसका लैंगिक नाम Villosiclava virens भी प्रयोग किया जाता है। रोगजनक मिट्टी, संक्रमित फसल-अवशेष तथा स्मट गेंदों में बने मोटी भित्ति वाले बीजाणुओं के माध्यम से जीवित रह सकता है। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि संक्रमण मुख्यतः बाली निकलने से पहले की बूटिंग अवस्था में फूलों के ऊतकों पर होता है, जबकि इसके स्पष्ट लक्षण बालियाँ निकलने के बाद दिखाई देते हैं। इसी कारण लक्षण दिखाई देने की प्रतीक्षा करना प्रबंधन की सबसे बड़ी भूल हो सकती है।

कैसे पहचानें फॉल्स स्मट?

रोग में धान के सामान्य दाने के स्थान पर शुरू में छोटी सफेद या पीली गांठ बनती है। बाद में यह फूलकर पीली, नारंगी-पीली, हरी और अंततः हरी-काली मखमली गेंद जैसी बन जाती है। ये स्मट गेंदें सामान्य धान के दाने से लगभग 2–5 गुना बड़ी हो सकती हैं।
परिपक्व होने पर इन पर बड़ी मात्रा में गहरे रंग का बीजाणु चूर्ण बनता है, जो छूने पर हाथ में लग जाता है और हवा तथा पानी के छींटों से आसपास फैल सकता है। प्रभावित पुष्पक में सामान्य दाना नहीं बनता और आसपास के दानों का भराव भी प्रभावित हो सकता है।

भोजन और पशु-चारे की गुणवत्ता भी चिंता का विषय

फॉल्स स्मट केवल उपज का प्रश्न नहीं है। आधुनिक अनुसंधानों में रोगजनक द्वारा यूस्टिलॉक्सिन, यूस्टिलाजिनोइडिन और सॉर्बिसिलिनॉइड जैसे जैव-विष उत्पन्न करने की पुष्टि हुई है। इसलिए अधिक संक्रमित स्मट गेंदों को खाद्यान्न या पशु-चारे में मिलाना उचित नहीं है। कटाई और मड़ाई के दौरान इन्हें यथासंभव अलग करना चाहिए।

किन परिस्थितियों में तेजी से बढ़ता है रोग?

बूटिंग से पुष्पन के समय 25–28 डिग्री सेल्सियस तापमान, अधिक आर्द्रता, लगातार बादल, वर्षा तथा लंबे समय तक नमी रोग के लिए विशेष रूप से अनुकूल माने जाते हैं। 2026 की समीक्षा में लगभग 28 डिग्री सेल्सियस तापमान और वर्षा-आर्द्रता को संक्रमण के महत्वपूर्ण कारकों में रखा गया है। अत्यधिक नाइट्रोजन देने से घनी और कोमल फसल बनती है तथा रोग का जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए संकर धान में अधिक उपज की चाह में जरूरत से ज्यादा यूरिया देना उल्टा नुकसान कर सकता है।

समेकित प्रबंधन ही सबसे सुरक्षित रास्ता

रोगमुक्त और प्रमाणित बीज का प्रयोग करें। जिस खेत में पिछले वर्ष फॉल्स स्मट अधिक था, वहाँ संक्रमित बालियों और स्मट गेंदों को खेत में छोड़ने के बजाय एकत्र कर नष्ट करें। मेड़ों एवं खेत में उगे वैकल्पिक खरपतवारों को नियंत्रित रखें। नाइट्रोजन को मिट्टी परीक्षण एवं क्षेत्रीय संस्तुति के अनुसार विभाजित मात्रा में दें तथा अनावश्यक अतिरिक्त यूरिया से बचें। उपलब्ध होने पर स्थानीय कृषि विश्वविद्यालय द्वारा अनुशंसित कम संवेदनशील किस्मों या संकरों को प्राथमिकता दें। वर्तमान शोध यह भी स्पष्ट करता है कि अभी पूर्ण और स्थायी प्रतिरोध वाली किस्मों की उपलब्धता सीमित है, इसलिए केवल किस्म पर निर्भर रहना उचित नहीं है।

फफूंदनाशक का समय दवा से भी अधिक महत्वपूर्ण

फॉल्स स्मट प्रबंधन में सबसे महत्वपूर्ण है कि फफूंदनाशक लक्षण दिखाई देने से पहले दिया जाए। भारत में पंजीकृत एक लेबल-दावा विकल्प ट्राइसाइक्लाजोल 20.4% + एजॉक्सीस्ट्रोबिन 6.8% एससी है, जिसकी अनुमोदित मात्रा 1 लीटर प्रति हेक्टेयर, 500 लीटर पानी में है। आधिकारिक लेबल के अनुसार पहला छिड़काव बूटिंग से लगभग 5 प्रतिशत बाली निकलने की अवस्था के बीच और आवश्यकता होने पर दूसरा छिड़काव 10–15 दिन बाद किया जा सकता है।


पिकॉक्सीस्ट्रोबिन 7.05% + प्रोपिकोनाजोल 11.7% एससी भी धान में फॉल्स स्मट के विरुद्ध पंजीकृत विकल्प है; इसकी लेबल मात्रा 1 लीटर प्रति हेक्टेयर, 500 लीटर पानी है। भारतीय क्षेत्र परीक्षणों में भी इस मिश्रण ने फॉल्स स्मट को प्रभावी ढंग से कम किया है।
एक ही क्रियाविधि वाले फफूंदनाशक का बार-बार उपयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि U. virens में कुछ फफूंदनाशकों के प्रति प्रतिरोध विकसित होने की रिपोर्टें सामने आ रही हैं।

किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण संदेश

फॉल्स स्मट में “रोग दिखा तब दवा डालेंगे” वाली रणनीति कारगर नहीं है। जब हरी-काली गेंदें दिखाई देती हैं, तब संबंधित पुष्पकों का संक्रमण बहुत पहले हो चुका होता है। इसलिए विशेषकर संकर एवं संवेदनशील धान में बूटिंग अवस्था से खेत की निगरानी, संतुलित नाइट्रोजन, मौसम पर नजर और सही समय पर अनुमोदित फफूंदनाशक का प्रयोग ही नुकसान को कम करने की कुंजी है।
नई तकनीकों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित रोग पूर्वानुमान, ड्रोन/हाइपरस्पेक्ट्रल चित्रण तथा आणविक LAMP परीक्षण जैसे साधनों पर तेजी से काम चल रहा है। शोध में हाइपरस्पेक्ट्रल तकनीक से संक्रमित दानों की पहचान लगभग 89–91 प्रतिशत सटीकता तक दर्ज की गई है। भविष्य में ऐसी तकनीकें फॉल्स स्मट की पूर्व चेतावनी और सटीक रोग प्रबंधन को और प्रभावी बना सकती हैं।

अस्वीकरण: इस लेख में व्यक्त विचार मेरे व्यक्तिगत वैज्ञानिक एवं शैक्षणिक दृष्टिकोण हैं। इनका मेरे संस्थान, डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, अथवा किसी सरकारी संस्था की आधिकारिक राय या नीति से कोई संबंध नहीं है। यह लेख केवल कृषि शिक्षा, जन-जागरूकता और जनहित के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है; इसमें किसी उत्पाद, संस्था या व्यावसायिक हित का प्रचार अथवा अनुशंसा नहीं की गई है। इसे प्रकाशित करने के पीछे मेरे व प्रकाशक संस्था (कृषि पिटारा) के मध्य किसी भी प्रकार का कोई आर्थिक या अन्य हित संबद्ध नहीं है।

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