Site icon Krishi Pitaara

चीनी की कीमतों में तेजी, स्टॉक और कीमतों को लेकर उठी जांच की मांग

Question on the rise in sugar prices

नई दिल्ली: देश में चीनी की कीमतों में हाल के महीनों में तेज बढ़ोतरी को लेकर सवाल उठने लगे हैं। दावा किया जा रहा है कि चीनी का भाव कुछ ही महीनों में करीब 3,800 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़कर 6,500 रुपये तक पहुंच गया। किसान नेता राजू शेट्टी ने आरोप लगाया है कि बाजार में चीनी की कमी का माहौल बनाया गया, जिसकी वजह से कीमतों में तेजी आई। हालांकि, कीमतों, उपलब्ध स्टॉक और कथित 22 हजार करोड़ रुपये के नुकसान से जुड़े इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है।

नवंबर में 3,500-3,600 रुपये था चीनी का भाव

दावे के मुताबिक, नवंबर 2025 में नए चीनी सीजन की शुरुआत के समय कीमत करीब 3,500 से 3,600 रुपये प्रति क्विंटल थी। इसके बाद जून 2026 तक भाव धीरे-धीरे बढ़कर करीब 3,800 रुपये प्रति क्विंटल पहुंच गया। इस दौरान कीमतों में बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव नहीं बताया गया, लेकिन जून के बाद बाजार में तेजी आने लगी।

एक महीने में 3,800 से 4,800 रुपये तक पहुंचा भाव

आरोप के मुताबिक, 20 जून से 20 जुलाई 2026 के बीच चीनी की कीमत बढ़कर करीब 4,800 रुपये प्रति क्विंटल पहुंच गई। इसके बाद 20 अगस्त तक भाव करीब 6,500 रुपये प्रति क्विंटल होने का दावा किया गया। इस तरह कुछ ही महीनों में करीब 2,700 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी बताई जा रही है। सवाल उठाया जा रहा है कि जब सीजन की शुरुआत में बाजार में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता बताई जा रही थी, तो अचानक इतनी बड़ी तेजी क्यों आई।

त्योहारों से पहले चीनी की कमी का माहौल बनाने का आरोप

दावे में कहा गया है कि चीनी के दाम बढ़ाने के लिए बाजार में आने वाले दिनों में कमी होने की आशंका का माहौल बनाया गया। गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली जैसे त्योहारों के दौरान मिठाइयों और अन्य खाद्य पदार्थों में चीनी की खपत बढ़ जाती है। ऐसे में कमी की आशंका पैदा होने पर व्यापारी और खरीदार ज्यादा मात्रा में चीनी खरीद सकते हैं। इससे मांग बढ़ने पर कीमतों पर दबाव आ सकता है। हालांकि, बाजार में इसी रणनीति के कारण कीमतें बढ़ीं, इसकी स्वतंत्र पुष्टि अभी जरूरी है।

सितंबर से दक्षिण भारत में शुरू होगा नया सीजन

दावे के मुताबिक, तमिलनाडु और दक्षिण कर्नाटक की कई चीनी मिलों में नया पेराई सीजन करीब 15 सितंबर के बाद शुरू होता है। इसके बाद इन क्षेत्रों से नई चीनी बाजार में आने की संभावना है, जिससे उपलब्धता बढ़ सकती है। इसी वजह से सवाल उठाया जा रहा है कि जब नया सीजन जल्द शुरू होने वाला है, तो कमी की आशंका के नाम पर कीमतों में इतनी तेजी क्यों आई।

22 हजार करोड़ रुपये के नुकसान का दावा

बयान में दावा किया गया है कि यदि चीनी की कीमत सामान्य स्तर से करीब 2,000 से 2,300 रुपये प्रति क्विंटल अधिक रहती है और एक करोड़ टन से अधिक चीनी की बिक्री पर इसका असर पड़ता है, तो कुल आर्थिक अंतर करीब 22,000 से 23,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। आरोप लगाने वालों का कहना है कि इस अतिरिक्त बोझ का असर आखिरकार आम उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है। हालांकि, इस अनुमान की पुष्टि के लिए बिक्री, कीमत और खपत के आधिकारिक आंकड़ों का विस्तृत विश्लेषण जरूरी है।

देश में चीनी की कमी है या पर्याप्त स्टॉक मौजूद है?

दावे के मुताबिक, नवंबर 2025 में नए चीनी सीजन की शुरुआत के समय पिछले सीजन की करीब 44.47 लाख टन चीनी का स्टॉक बचा हुआ था। इसके अलावा पूरे सीजन में करीब 291 लाख टन चीनी के उत्पादन का दावा किया गया। इस आधार पर कुल उपलब्धता करीब 321 लाख टन बताई गई। दावे में यह भी कहा गया है कि इस उपलब्धता के बावजूद करीब 9 लाख टन चीनी के निर्यात की अनुमति दी गई। ऐसे में सवाल उठाया जा रहा है कि यदि देश में इतना स्टॉक और उत्पादन था, तो अचानक बाजार में चीनी की कमी कैसे पैदा हुई।

हर महीने चीनी बाजार में जारी करने की व्यवस्था

बयान में कहा गया है कि सरकार घरेलू बाजार में उपलब्धता बनाए रखने के लिए हर महीने करीब 22 लाख टन चीनी की बिक्री की अनुमति देती है। इसका उद्देश्य बाजार में पर्याप्त आपूर्ति बनाए रखना और कीमतों को नियंत्रित करने में मदद करना है। आरोप लगाने वालों का कहना है कि यदि पर्याप्त चीनी उपलब्ध थी और हर महीने बाजार में बिक्री की अनुमति भी दी जा रही थी, तो फिर बड़ी मात्रा में चीनी के गायब होने का सवाल उठता है। हालांकि, उत्पादन, पुराने स्टॉक, घरेलू खपत, निर्यात और मासिक बिक्री के आंकड़ों को एक साथ देखने के बाद ही इसकी सही तस्वीर सामने आएगी।

45 लाख टन चीनी कहां गई, उठाया गया सवाल

बयान में करीब 45 लाख टन चीनी के स्टॉक को लेकर भी सवाल उठाया गया है। आरोप है कि अगर इतनी बड़ी मात्रा में चीनी देश से बाहर गई है, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि वह किस रास्ते से और कहां भेजी गई। इस दावे को समझाने के लिए करीब 3 लाख ट्रकों का उदाहरण भी दिया गया है। हालांकि, इस आंकड़े और इससे जुड़े निष्कर्ष की पुष्टि के लिए आधिकारिक परिवहन, निर्यात और व्यापारिक रिकॉर्ड की जरूरत होगी।

व्यापारियों और चीनी मिलों की भूमिका पर सवाल

आरोपों में कुछ चीनी मिल मालिकों और व्यापारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। कहा गया है कि कई सहकारी और निजी चीनी मिलें उत्पादन के साथ व्यापारिक गतिविधियों में भी शामिल हैं। ऐसे में बाजार में चीनी की खरीद-बिक्री से जुड़े हितों में पारदर्शिता जरूरी है। आरोप है कि कुछ कारोबारियों ने मिलकर ऐसा माहौल बनाया, जिससे त्योहारों के दौरान चीनी की कमी की आशंका पैदा हुई और कीमतें बढ़ गईं। हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि के लिए संबंधित व्यापारियों, चीनी मिलों और सरकारी एजेंसियों का पक्ष सामने आना जरूरी है।

सरकार से आंकड़े स्पष्ट करने की मांग

चीनी की कीमतों और उपलब्धता को लेकर लगाए गए आरोपों के बीच सरकार से बाजार की पूरी तस्वीर स्पष्ट करने की मांग की जा रही है। इसमें कुल उत्पादन, शुरुआती स्टॉक, घरेलू खपत, निर्यात, मासिक बिक्री और मौजूदा उपलब्धता के आंकड़े स्पष्ट करने की मांग शामिल है। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि देश में पर्याप्त चीनी उपलब्ध थी, तो जून से अगस्त के बीच कीमतों में इतनी बड़ी बढ़ोतरी क्यों हुई। इस सवाल का स्पष्ट जवाब आधिकारिक आंकड़ों और स्वतंत्र जांच के बाद ही सामने आ सकेगा।

ये भी पढ़ें: महाराष्ट्र में 10 हजार किसानों से शुरू होगा एआई आधारित स्मार्ट खेती प्रोजेक्ट

Exit mobile version