शिमला: लगातार बारिश और अचानक आई बाढ़ ने हिमाचल प्रदेश में भारी तबाही मचा दी है। न केवल सड़कें और पुल जैसी बुनियादी संरचना बर्बाद हुई हैं, बल्कि राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले सेब उद्योग पर भी इसका गहरा असर पड़ा है। कुल्लू-मनाली राष्ट्रीय राजमार्ग के कई हिस्से टूट जाने से तैयार फसल बागों से निकलकर मंडियों तक नहीं पहुंच पा रही है।
बागों में इस समय लाल-लाल सेब पूरी तरह से तैयार लटके हुए हैं, लेकिन भारी बारिश और खराब मौसम ने उनकी क्वालिटी पर असर डाला है। कई जगह फलों के गिरने की घटनाएं भी देखने को मिल रही हैं। बाग मालिकों का कहना है कि यह सीजन पूरी तरह से चौपट हो गया है। उनका कहना है कि बारिश और राजमार्गों को हुए नुकसान से सेब उद्योग को बहुत बड़ा झटका लगा है। यह उद्योग करीब 6000 करोड़ रुपये का है और छोटे किसानों की 80 प्रतिशत निर्भरता इसी पर है। तैयार सेबों को बाजार तक ले जाने का कोई साधन नहीं बचा और खरीदार भी नहीं मिल रहे हैं। पैकिंग केंद्रों पर सेबों का ढेर लगा हुआ है। मजदूरों का कहना है कि वे सेब पैक कर रहे हैं लेकिन सड़कें बंद होने के कारण उन्हें गोदामों में ही स्टोर करना पड़ रहा है। सामान्यतः 15 अगस्त तक सेब मंडियों में पहुंच जाते थे, लेकिन इस बार मौसम की मार से फसल बर्बाद हो गई है।
हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा सहारा बागवानी है और सेब की खेती से लाखों परिवारों का गुजारा चलता है। कुल्लू जिला राज्य का दूसरा सबसे बड़ा सेब उत्पादक क्षेत्र है, जहां से हर साल लगभग 1.5 लाख पेटियां यानी करीब 1.3 लाख मीट्रिक टन सेब देशभर की मंडियों में भेजा जाता है। लेकिन इस बार हालात इतने खराब हो गए हैं कि बागवान फसल तोड़कर गोदामों में रखे हुए हैं, पर उन्हें बेच नहीं पा रहे। बाढ़ और बारिश से 397 सड़कें और 3 राष्ट्रीय राजमार्ग बंद पड़े हैं। एनएच-3 समेत कुल्लू जिले के कई संपर्क मार्ग क्षतिग्रस्त हैं। ट्रक रास्तों में फंसे रहते हैं और देरी के कारण सेब खराब हो रहा है। इस वजह से लाखों रुपये का नुकसान हो रहा है।
पहले सब्जी किसानों को घाटा झेलना पड़ा था और अब सेब बागवानों पर संकट टूट पड़ा है। स्थानीय मंडियों में खरीदार नहीं हैं और जो हैं भी, वे बेहद कम दाम पर खरीदारी कर रहे हैं। सेब का भाव 40–45 रुपये किलो तक गिर चुका है, जो दस साल पहले के स्तर से भी कम है। व्यापारी भी असहाय हैं क्योंकि उनके पास माल को शहरों तक पहुंचाने का कोई साधन नहीं है। सीजन का लंबे समय से इंतजार करने वाले किसान और व्यापारी इस बार भारी घाटे से जूझ रहे हैं। उनका कहना है कि अगर जल्द राहत और मुआवज़े की व्यवस्था नहीं हुई तो सेब उद्योग की कमर पूरी तरह टूट जाएगी।

