नई दिल्ली: गिन्नी घास पशुओं के लिए पौष्टिक हरा चारा उपलब्ध कराने वाली उपयोगी बहुवर्षीय घास है। इसका इस्तेमाल हरे चारे और साइलेज बनाने में किया जाता है। यह लगभग 3 से 4 मीटर तक ऊंची हो सकती है। इसके पत्ते लंबे होते हैं और इनके बीच की मुख्य नस चौड़ी होती है। गिन्नी घास उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में अच्छी तरह उगती है। भारत में पंजाब सहित कई राज्यों में इसकी खेती की जाती है। उचित किस्म, संतुलित खाद, सिंचाई और समय पर कटाई से किसान लंबे समय तक इससे हरा चारा प्राप्त कर सकते हैं।
गिन्नी घास की खेती के लिए जलवायु
गिन्नी घास गर्म जलवायु में अच्छी वृद्धि करती है। इसकी खेती के लिए सामान्यतः 19 से 23 डिग्री सेल्सियस तापमान अनुकूल माना जाता है, जबकि बुवाई के समय 19 से 26 डिग्री सेल्सियस तापमान बेहतर रहता है। लगभग 1,000 से 1,100 मिलीमीटर वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में इसकी अच्छी बढ़वार हो सकती है। अधिक गर्मी में पौधों को पर्याप्त नमी की जरूरत होती है, लेकिन खेत में पानी जमा नहीं होना चाहिए।
मिट्टी और खेत की तैयारी
गिन्नी घास की खेती उपजाऊ, नमी बनाए रखने वाली और अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी में बेहतर होती है। गहरी मिट्टी में इसकी जड़ें अच्छी तरह विकसित होती हैं। भारी चिकनी तथा पानी रोकने वाली मिट्टी में इसकी खेती से बचना चाहिए। खेत तैयार करने के लिए हल से जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा और समतल कर लें। इसके बाद पाटा लगाकर समतल बीज शय्या तैयार करें, ताकि बीजों का अंकुरण अच्छा हो सके।
गिन्नी घास की प्रमुख किस्में और पैदावार
गिन्नी घास की कई किस्में उपलब्ध हैं। इनमें पंजाब गिन्नी घास की खेती के लिए उपयुक्त क्षेत्र माना जाता है। किस्म का चुनाव स्थानीय जलवायु, मिट्टी और सिंचाई की उपलब्धता के आधार पर करना चाहिए।
- पीजीजी-101: यह किस्म वर्ष 1991 में विकसित की गई थी। इसके बीज मोटे और गहरे रंग के होते हैं। मई से नवंबर के बीच फूल आने से पहले कटाई करना उपयोगी रहता है। इसकी औसत हरे चारे की पैदावार लगभग 675 क्विंटल प्रति एकड़ बताई गई है। इससे 5 से 7 कटाइयां ली जा सकती हैं।
- पीजीजी-518: यह किस्म वर्ष 1998 में विकसित की गई थी। इसके पत्ते लंबे और चौड़े होते हैं। उचित बढ़वार होने पर कटाई की जाती है। इसकी औसत पैदावार लगभग 750 क्विंटल प्रति एकड़ बताई गई है और इससे 5 से 7 कटाइयां ली जा सकती हैं।
- पीजीजी-19: यह पंजाब के लिए अनुकूल किस्म है। इसकी औसत पैदावार लगभग 450 से 500 क्विंटल प्रति एकड़ बताई गई है।
- सीओ-2: इसकी वार्षिक पैदावार लगभग 1,100 क्विंटल प्रति एकड़ बताई गई है। इससे सात कटाइयां ली जा सकती हैं।
- सीओ (जीजी)-3: इसकी वार्षिक हरे चारे की पैदावार लगभग 1,400 से 1,450 क्विंटल प्रति एकड़ बताई गई है। इससे सात कटाइयां ली जा सकती हैं।
- हामिल: यह उत्तर, दक्षिण और मध्य भारत के लिए अनुकूल मानी जाती है। इसकी औसत पैदावार लगभग 208 क्विंटल प्रति एकड़ बताई गई है।
- पीजीजी-1: यह उत्तर-पश्चिमी और मध्य भारत के साथ पहाड़ी क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। इसकी औसत पैदावार लगभग 210 क्विंटल प्रति एकड़ बताई गई है।
पैदावार मिट्टी, मौसम, खाद, सिंचाई और कटाई के प्रबंधन के अनुसार बदल सकती है। इसलिए बीज खरीदने से पहले स्थानीय कृषि विशेषज्ञ से किस्म की उपयुक्तता की पुष्टि करना बेहतर है।
बुवाई का समय और बीज की मात्रा
गिन्नी घास की बुवाई सामान्यतः मध्य मार्च से मध्य मई के बीच की जाती है। अच्छी बढ़वार के लिए कतारों और पौधों के बीच लगभग 50 × 30 सेंटीमीटर या 90 × 45 सेंटीमीटर का अंतर रखा जा सकता है। बुवाई छिटकवां विधि या कतारों में की जा सकती है। कतारों में बुवाई करने से निराई-गुड़ाई और पौधों की देखभाल करना आसान रहता है।
अच्छी फसल के लिए लगभग 6 से 8 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ की मात्रा बताई गई है। बीज की वास्तविक मात्रा किस्म और बुवाई की विधि के अनुसार अलग हो सकती है। बीज उपचार के लिए तेजाब जैसे रसायनों का इस्तेमाल स्वयं न करें। इसके बजाय कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार सुरक्षित और अनुशंसित उपचार अपनाएं।
पौध तैयार करना और रोपाई
गिन्नी घास को पौध तैयार करके भी लगाया जा सकता है। इसके लिए तैयार की गई क्यारियों में बीज लगभग 1 से 2 सेंटीमीटर गहराई पर बोएं और नमी बनाए रखें। बुवाई के लगभग 35 से 45 दिन बाद, जब पौधों में 3 से 4 पत्तियां आ जाएं, तब उन्हें खेत में रोपने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। रोपाई से पहले क्यारियों में हल्का पानी दें, ताकि पौधों को आसानी से निकाला जा सके। रोपाई मॉनसून आने से पहले या सिंचाई की पर्याप्त सुविधा होने पर करें।
खाद और उर्वरक प्रबंधन
खेत तैयार करते समय अच्छी तरह सड़ी गोबर की खाद डालने से मिट्टी की उर्वरता और नमी बनाए रखने की क्षमता में सुधार होता है। उपलब्ध कृषि सलाह के अनुसार 20 से 25 टन गोबर की खाद प्रति एकड़ इस्तेमाल की जा सकती है। नाइट्रोजन की मात्रा बुवाई के लगभग 20 और 35 दिन बाद तथा प्रत्येक कटाई के बाद देने की सिफारिश की जाती है।
खाद की सही मात्रा मिट्टी की जांच, किस्म और फसल की बढ़वार पर निर्भर करती है। इसलिए यूरिया और अन्य उर्वरकों का इस्तेमाल मिट्टी परीक्षण तथा स्थानीय कृषि विभाग की सलाह के अनुसार करें। प्रत्येक कटाई के बाद खाद देने से नई पत्तियों और तनों की वृद्धि में मदद मिल सकती है।
खरपतवार नियंत्रण और सिंचाई
खरपतवार गिन्नी घास के पौधों से पोषक तत्व, पानी और जगह के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। शुरुआती अवस्था में खेत को खरपतवार मुक्त रखना जरूरी है। इसके लिए समय-समय पर निराई-गुड़ाई करें। मल्चिंग से मिट्टी की नमी बनाए रखने और खरपतवारों को नियंत्रित करने में भी मदद मिल सकती है। खरपतवारनाशक का प्रयोग केवल घास की फसल के लिए अनुमोदित उत्पाद और निर्धारित मात्रा के अनुसार करें।
बुवाई के तुरंत बाद पहली सिंचाई करें। दूसरी सिंचाई मौसम और मिट्टी की नमी के अनुसार लगभग 4 से 6 दिन बाद की जा सकती है। गर्मियों में जरूरत के अनुसार कम अंतराल पर सिंचाई करें। बरसात के मौसम में वर्षा पर्याप्त होने पर सिंचाई की जरूरत कम हो सकती है। ध्यान रखें कि खेत में पानी जमा न हो, क्योंकि अधिक जलभराव से पौधों की जड़ों को नुकसान पहुंच सकता है।
प्रमुख कीट और रोगों से बचाव
गिन्नी घास पर घास का टिड्डा हमला कर सकता है। यह नई पत्तियों को खाकर पौधों की बढ़वार प्रभावित करता है। खेत का नियमित निरीक्षण करें और कीट दिखाई देने पर स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह से उचित नियंत्रण उपाय अपनाएं।
पत्तियों पर धब्बे, काले धब्बे, गोंदिया रोग और मुरझाने जैसी समस्याएं भी फसल को नुकसान पहुंचा सकती हैं। रोगग्रस्त पत्तियों और पौधों की पहचान समय पर करना जरूरी है। खेत में जल निकासी अच्छी रखें और संक्रमित अवशेषों को हटाएं। किसी भी कवकनाशी या कीटनाशक का प्रयोग करने से पहले रोग या कीट की सही पहचान कराएं तथा उत्पाद के लेबल और कृषि विभाग की सलाह का पालन करें।
गिन्नी घास की कटाई और चारे का प्रबंधन
गिन्नी घास की पहली कटाई सामान्यतः बुवाई के लगभग 55 दिन बाद की जा सकती है। इसके बाद मौसम और पौधों की बढ़वार के अनुसार लगभग 25 से 30 दिन के अंतराल पर कटाई की जाती है। अनुकूल परिस्थितियों में इससे एक वर्ष में 5 से 7 कटाइयां मिल सकती हैं। कटाई का समय पौधों की ऊंचाई, पत्तियों की मात्रा और चारे की गुणवत्ता के आधार पर तय करें। कटाई के बाद फसल को दोबारा बढ़ने के लिए पर्याप्त नमी और पोषक तत्व उपलब्ध कराएं। समय पर कटाई और उचित देखभाल से लंबे समय तक हरा चारा प्राप्त किया जा सकता है, जिससे पशुपालकों को चारे की उपलब्धता बनाए रखने में मदद मिलती है।
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