नई दिल्ली: मक्का देश की प्रमुख अनाज और चारा फसलों में शामिल है। इसे ‘अनाज की रानी’ भी कहा जाता है, क्योंकि इसकी खेती खाद्यान्न, पशु आहार और अनेक औद्योगिक उत्पादों के लिए की जाती है। मक्के से स्टार्च, कॉर्न फ्लेक्स, ग्लूकोज और तेल जैसे उत्पाद तैयार किए जाते हैं। मुर्गीपालन में भी मक्का का उपयोग पशु आहार के रूप में बड़े पैमाने पर होता है। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और पंजाब सहित कई राज्यों में मक्का की खेती की जाती है। दक्षिण भारत में आंध्र प्रदेश और कर्नाटक प्रमुख उत्पादक राज्यों में शामिल हैं। मक्का की एक खासियत यह है कि उपयुक्त किस्म और सही कृषि प्रबंधन अपनाकर इसे अलग-अलग जलवायु और मिट्टी वाले क्षेत्रों में उगाया जा सकता है। इसकी कई किस्में लगभग 70 से 100 दिनों में तैयार हो जाती हैं, जिससे किसानों को फसल चक्र की योजना बनाने में मदद मिलती है। हालांकि, अच्छी पैदावार के लिए सही किस्म का चुनाव, संतुलित पोषण, समय पर बुवाई और सिंचाई का उचित प्रबंधन जरूरी है।
मक्का की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु और मिट्टी
मक्का की अच्छी वृद्धि के लिए सामान्यतः 25 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान अनुकूल माना जाता है। लगभग 50 से 100 सेंटीमीटर वर्षा वाले क्षेत्रों में इसकी खेती की जा सकती है, लेकिन वास्तविक जरूरत किस्म, मौसम और मिट्टी के अनुसार बदलती है। मक्का की फसल को विशेष रूप से पौधों की बढ़वार, फूल निकलने और दाने बनने के समय पर्याप्त नमी की जरूरत होती है। इस दौरान पानी की कमी होने पर पैदावार प्रभावित हो सकती है। मिट्टी की बात करें तो अच्छी जल निकासी वाली उपजाऊ दोमट, मैरा और लाल मिट्टी मक्का के लिए उपयुक्त मानी जाती है। सामान्यतः 5.5 से 7.5 के बीच अम्लीयता स्तर वाली मिट्टी में इसकी खेती अच्छी हो सकती है। बहुत भारी मिट्टी, जिसमें पानी लंबे समय तक जमा रहता हो, फसल के लिए नुकसानदायक हो सकती है। बुवाई से पहले मिट्टी की जांच कराने से नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और सूक्ष्म पोषक तत्वों की जरूरत का पता लगाया जा सकता है।
मक्का की प्रमुख किस्में और उनकी पैदावार
मक्का की किस्म का चयन खेती के मौसम, सिंचाई की सुविधा, फसल के उद्देश्य और स्थानीय जलवायु को ध्यान में रखकर करना चाहिए। पंजाब के लिए उपलब्ध कृषि विवरण में कई ऐसी किस्मों का उल्लेख है, जो खरीफ, बसंत या गर्मी के मौसम में उगाई जा सकती हैं। इन किस्मों की पकने की अवधि और औसत पैदावार अलग-अलग है। नीचे दिए गए आंकड़े उपलब्ध कराई गई जानकारी पर आधारित हैं। बीज खरीदने से पहले किसानों को संबंधित कृषि विश्वविद्यालय या कृषि विभाग से वर्तमान अनुशंसा और अपने क्षेत्र में किस्म की उपयुक्तता की पुष्टि करनी चाहिए।
पीएमएच 1 और प्रभात: अधिक अवधि वाली किस्में
पीएमएच 1 पंजाब के सिंचित क्षेत्रों में खरीफ, बसंत और गर्मी के मौसम में उगाई जाने वाली किस्म के रूप में बताई गई है। इसकी फसल लगभग 95 दिनों में पकती है और औसत पैदावार करीब 21 क्विंटल प्रति एकड़ बताई गई है। इसका तना मजबूत और जामुनी रंग का होता है। प्रभात भी लगभग 95 दिनों में तैयार होने वाली किस्म है। इसके पौधों का कद मध्यम से लंबा, तना मोटा और पौधे गिरने की आशंका अपेक्षाकृत कम बताई गई है। इसकी औसत पैदावार करीब 17.5 क्विंटल प्रति एकड़ है। इन किस्मों का चयन करते समय किसान सिंचाई की उपलब्धता, बुवाई का मौसम और स्थानीय कृषि अनुशंसाओं को ध्यान में रखें।
केसरी, पीएमएच-2 और जेएच 3459: कम अवधि में तैयार होने वाली किस्में
केसरी मक्का की मध्यम अवधि वाली किस्म है, जो लगभग 85 दिनों में पकती है। इसके दाने केसरी रंग के होते हैं और औसत पैदावार करीब 16 क्विंटल प्रति एकड़ बताई गई है। पीएमएच-2 कम अवधि में तैयार होने वाली संकर किस्म है, जिसकी पकने की अवधि लगभग 83 दिन है। इसे सिंचित और कम वर्षा वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त बताया गया है तथा इसकी औसत पैदावार लगभग 16.6 क्विंटल प्रति एकड़ है। जेएच 3459 लगभग 84 दिनों में पकने वाली किस्म है। इसे सूखा सहन करने वाली और कम गिरने वाली किस्म के रूप में बताया गया है। इसके दाने संतरी रंग के होते हैं और औसत पैदावार करीब 17.5 क्विंटल प्रति एकड़ है। कम अवधि वाली किस्में फसल चक्र की योजना बनाने में उपयोगी हो सकती हैं, लेकिन बुवाई से पहले क्षेत्रवार अनुशंसा की पुष्टि करना जरूरी है।
प्रकाश, मेघा और पंजाब साथी 1
प्रकाश किस्म लगभग 82 दिनों में तैयार होती है और इसे तेजी से बढ़ने वाली तथा सूखा सहन करने वाली किस्म के रूप में वर्णित किया गया है। इसकी औसत पैदावार 15 से 17 क्विंटल प्रति एकड़ बताई गई है। मेघा भी करीब 82 दिनों में पकने वाली किस्म है। इसके दाने पीले और संतरी रंग के होते हैं तथा औसत पैदावार लगभग 12 क्विंटल प्रति एकड़ बताई गई है। पंजाब साथी 1 गर्मी के मौसम की कम अवधि वाली किस्म है, जो करीब 70 दिनों में तैयार हो सकती है। इसे गर्मी सहन करने वाली किस्म के रूप में बताया गया है और इसकी औसत पैदावार लगभग नौ क्विंटल प्रति एकड़ है। इन किस्मों की वास्तविक उपज मौसम, मिट्टी, पौधों की संख्या और फसल प्रबंधन पर निर्भर करेगी।
पर्ल पॉपकॉर्न और पंजाब स्वीट कॉर्न
पर्ल पॉपकॉर्न पॉपकॉर्न बनाने के उद्देश्य से उगाई जाने वाली किस्म है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, यह पंजाब के सिंचित क्षेत्रों में उगाई जा सकती है और लगभग 88 दिनों में तैयार होती है। इसकी बालियां लंबी और पतली तथा दाने छोटे और गोल होते हैं। इसकी औसत पैदावार करीब 12 क्विंटल प्रति एकड़ बताई गई है। दूसरी ओर, पंजाब स्वीट कॉर्न को ताजा और मीठे भुट्टों के व्यावसायिक उत्पादन के लिए उपयोगी बताया गया है। इसके कच्चे दानों में मिठास अधिक होती है और फसल लगभग 95 से 100 दिनों में तैयार होती है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इसकी औसत पैदावार करीब 50 क्विंटल प्रति एकड़ है। स्वीट कॉर्न की खेती करने वाले किसानों को बाजार की मांग, कटाई के सही समय और भुट्टों को जल्दी बाजार तक पहुंचाने की व्यवस्था पर ध्यान देना चाहिए।
मक्का की बुवाई का सही समय और दूरी
मक्का की बुवाई का समय मौसम और किस्म के अनुसार तय किया जाता है। खरीफ की फसल आमतौर पर मई के अंतिम सप्ताह से जून के दौरान मानसून के आगमन के आसपास बोई जाती है। बसंत की फसल के लिए फरवरी के अंतिम सप्ताह से मार्च के अंत तक का समय उपयोगी हो सकता है। हालांकि, क्षेत्रीय मौसम और कृषि विभाग की सलाह के अनुसार इसमें बदलाव हो सकता है। बेबी कॉर्न की खेती कई क्षेत्रों में साल के अधिकतर समय की जा सकती है, लेकिन स्थानीय तापमान और बाजार की मांग का ध्यान रखना जरूरी है। स्वीट कॉर्न के लिए खरीफ और रबी का मौसम कई क्षेत्रों में उपयुक्त माना जाता है।
फसल के उद्देश्य के अनुसार पौधों की दूरी
मक्का की बुवाई में कतारों और पौधों के बीच उचित दूरी रखने से पौधों को पर्याप्त प्रकाश, पानी और पोषक तत्व मिलते हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, खरीफ मक्का के लिए लगभग 62 × 20 सेंटीमीटर की दूरी सुझाई गई है। स्वीट कॉर्न के लिए 60 × 20 सेंटीमीटर, बेबी कॉर्न के लिए 60 × 20 या 60 × 15 सेंटीमीटर, पॉपकॉर्न के लिए 50 × 15 सेंटीमीटर और चारे वाली मक्का के लिए 30 × 10 सेंटीमीटर की दूरी बताई गई है। ये सामान्य संदर्भ हैं; सही दूरी किस्म, बुवाई की विधि और स्थानीय कृषि अनुशंसाओं के अनुसार तय करनी चाहिए। सामान्य मक्का के बीज लगभग तीन से चार सेंटीमीटर गहराई पर बोए जा सकते हैं, जबकि स्वीट कॉर्न के लिए करीब 2.5 सेंटीमीटर गहराई बताई गई है।
बीज की मात्रा और उपचार
मक्का की बीज दर फसल के उद्देश्य, किस्म, बीज के आकार और बुवाई की विधि पर निर्भर करती है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, खरीफ मक्का के लिए आठ से दस किलोग्राम बीज प्रति एकड़, स्वीट कॉर्न के लिए लगभग आठ किलोग्राम, बेबी कॉर्न के लिए 16 किलोग्राम, पॉपकॉर्न के लिए सात किलोग्राम और चारे वाली मक्का के लिए करीब 20 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ की मात्रा बताई गई है। वास्तविक बीज दर के लिए बीज पैकेट पर दिए गए निर्देश और कृषि विशेषज्ञों की सलाह को प्राथमिकता दें। प्रमाणित बीज का इस्तेमाल करने से किस्म की शुद्धता और अंकुरण संबंधी जोखिम कम करने में मदद मिल सकती है।
बीज उपचार में रखें सावधानी
बीज उपचार का उद्देश्य बीज और शुरुआती पौधों को कुछ बीमारियों तथा कीटों से बचाना होता है। लेकिन उपचार के लिए रसायन का चुनाव फसल, रोग और स्थानीय अनुशंसा के अनुसार होना चाहिए। उपलब्ध सामग्री में कुछ फफूंदनाशकों और कीटनाशकों की मात्रा दी गई है, लेकिन बिना वर्तमान आधिकारिक पुष्टि के इनका उपयोग नहीं करना चाहिए। गलत रसायन, अधिक मात्रा या अनुचित मिश्रण से बीज के अंकुरण, पौधों, मिट्टी और मानव स्वास्थ्य को नुकसान पहुंच सकता है। किसानों को केवल पंजीकृत उत्पाद का उपयोग उसके लेबल पर दिए निर्देशों के अनुसार करना चाहिए। जैव उर्वरक और रासायनिक उपचार के बीच अनुकूलता की पुष्टि करना भी जरूरी है।
खाद और पोषण प्रबंधन से बढ़ाएं उत्पादन
मक्का की अच्छी पैदावार के लिए संतुलित पोषण जरूरी है। नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश की मात्रा मिट्टी की जांच, किस्म और अपेक्षित उत्पादन के अनुसार तय की जानी चाहिए। उपलब्ध कृषि विवरण में प्रति एकड़ यूरिया, फास्फेट उर्वरक और पोटाश की मात्रा दी गई है, लेकिन इन मात्राओं को हर खेत पर एक जैसा लागू नहीं करना चाहिए। मिट्टी की जांच के आधार पर उर्वरकों की सही मात्रा तय करना अधिक उपयुक्त है। नाइट्रोजन की पूरी मात्रा एक साथ देने के बजाय फसल की अवस्था के अनुसार बांटकर देने की सलाह कई परिस्थितियों में उपयोगी होती है। जिंक, मैग्नीशियम और लोहे की कमी भी मक्का की वृद्धि को प्रभावित कर सकती है। यदि पत्तियों में पीलापन या असामान्य रंग दिखाई दे, तो पहले कमी की सही पहचान करें और उसके बाद अनुशंसित पोषक तत्व का इस्तेमाल करें।
खरपतवार नियंत्रण और सिंचाई का प्रबंधन
मक्का की फसल में शुरुआती 35 से 45 दिन खरपतवार नियंत्रण के लिहाज से महत्वपूर्ण होते हैं। खरपतवार पानी, पोषक तत्व और प्रकाश के लिए फसल से प्रतिस्पर्धा करते हैं, जिससे उत्पादन में कमी आ सकती है। जरूरत के अनुसार पहली निराई-गुड़ाई बुवाई के 20 से 25 दिन बाद और दूसरी 40 से 45 दिन बाद की जा सकती है। खरपतवारनाशी का इस्तेमाल करने से पहले फसल की अवस्था, खरपतवार के प्रकार और उत्पाद के लेबल की जांच जरूरी है। सिंचाई के मामले में खेत में पानी जमा नहीं होने देना चाहिए। पौधों की शुरुआती अवस्था में जरूरत से ज्यादा पानी देने से बचें, लेकिन मिट्टी में पर्याप्त नमी बनाए रखें। पौधों के घुटने की ऊंचाई तक पहुंचने, फूल निकलने और दाने बनने के समय पानी की कमी से उपज पर अधिक असर पड़ सकता है।
मक्का की प्रमुख बीमारियां और कीट
मक्का में तना गलन, पत्ता झुलसा, पत्तियों पर धब्बे और फूल आने के बाद तने के गलने जैसी समस्याएं हो सकती हैं। कुछ रोगों में पत्तियों पर छोटे धब्बे बनते हैं, जो आगे चलकर बड़े होकर पत्ते का काफी हिस्सा प्रभावित कर सकते हैं। तना गलन में पौधे का तना कमजोर होकर टूट सकता है या पौधा गिर सकता है। इन समस्याओं को कम करने के लिए खेत में पानी जमा होने से रोकें, फसल चक्र अपनाएं, रोग प्रतिरोधी किस्मों का चयन करें और खेत की नियमित निगरानी करें। तना छेदक, गुलाबी छेदक, कॉर्न वार्म, दीमक और शाख की मक्खी जैसे कीट भी फसल को नुकसान पहुंचा सकते हैं। कीट नियंत्रण के लिए पहले सही पहचान करें और जरूरत होने पर कृषि विशेषज्ञ की सलाह से पंजीकृत कीटनाशक या जैविक उपाय अपनाएं। किसी भी रसायन की मात्रा और प्रयोग की विधि उसके लेबल के अनुसार ही रखें।
मक्का की कटाई और कटाई के बाद की देखभाल
दाने वाली मक्का की कटाई का समय बालियों के बाहरी आवरण, पौधों के सूखने और दानों की नमी के आधार पर तय किया जाता है। कटाई के बाद बालियों और दानों को साफ तथा सूखी जगह पर रखें, ताकि नमी और फफूंद के कारण गुणवत्ता प्रभावित न हो। स्वीट कॉर्न की कटाई में समय का विशेष महत्व है। भुट्टे पूरे आकार में पहुंच जाएं और दाने दबाने पर दूधिया रस निकलने लगे, तो कटाई के लिए उपयुक्त अवस्था हो सकती है। देर से कटाई करने पर मिठास कम हो सकती है। बेबी कॉर्न की कटाई आमतौर पर भुट्टे निकलने के बाद छोटी अवस्था में की जाती है और बाजार की जरूरत के अनुसार कई बार तुड़ाई करनी पड़ सकती है। पॉपकॉर्न के लिए भुट्टों को पर्याप्त रूप से सूखने देना जरूरी होता है। स्वीट कॉर्न और बेबी कॉर्न को कटाई के बाद जल्द छंटाई, पैकिंग और ठंडा करने की व्यवस्था तक पहुंचाना गुणवत्ता बनाए रखने में मदद करता है।
कुल मिलाकर, मक्का किसानों के लिए अनाज, चारा और व्यावसायिक उत्पादन के कई अवसर प्रदान करती है। बेहतर परिणाम पाने के लिए सही किस्म, समय पर बुवाई, उचित पौध दूरी, मिट्टी की जांच के आधार पर पोषण प्रबंधन और रोग-कीटों की समय पर पहचान जरूरी है। किसानों को पुरानी या अपुष्ट कृषि सिफारिशों को सीधे अपनाने के बजाय अपने क्षेत्र के कृषि विभाग और कृषि विश्वविद्यालय की वर्तमान सलाह के अनुसार खेती करनी चाहिए।
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