नई दिल्ली: गन्ना भारत की प्रमुख नकदी फसलों में से एक है, जिस पर लाखों किसानों की रोज़ी-रोटी टिकी हुई है। खासकर उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और हरियाणा जैसे राज्यों में गन्ना किसानों की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। वर्तमान समय में किसान शरदकालीन गन्ने की बुवाई की तैयारी कर रहे हैं, और विशेषज्ञ मानते हैं कि यही सही समय है खेती के आधुनिक और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाने का।
पारंपरिक पद्धतियों से जहां लागत बढ़ जाती है, वहीं उत्पादन और मुनाफा उम्मीद के मुताबिक नहीं मिल पाता। इस समस्या के समाधान के लिए कृषि वैज्ञानिकों और गन्ना विकास विभाग ने “पंचामृत” नामक पांच वैज्ञानिक विधियों का सुझाव दिया है। इन तकनीकों को अपनाकर किसान न केवल अपनी उपज बढ़ा सकते हैं, बल्कि खर्च भी कम कर सकते हैं। आइए जानते हैं इन पांच तरीकों के बारे में विस्तार से:
1. ट्रेंच विधि से बुवाई: पैदावार 20% तक बढ़ेगी
ट्रेंच विधि में खेत में गहरी नालियां बनाकर गन्ने की बुवाई की जाती है। इससे पौधों की जड़ें गहराई तक जाती हैं और वे अधिक मजबूत बनते हैं। खाद सीधे जड़ों तक पहुंचती है, जिससे उसका नुकसान नहीं होता। इस विधि से निराई-गुड़ाई भी आसान हो जाती है और 15-20% तक अतिरिक्त पैदावार संभव है।
2. सहफसली खेती: डबल इनकम का रास्ता
गन्ने की पंक्तियों के बीच खाली जगह में किसान आलू, प्याज, मटर, मसूर या धनिया जैसी फसलें उगा सकते हैं। इससे अतिरिक्त आमदनी होती है और अगर गन्ने की फसल किसी कारणवश खराब हो जाए तो दूसरी फसल से आय सुनिश्चित रहती है। दलहनी फसलें मिट्टी की उर्वरता भी बढ़ाती हैं।
3. ड्रिप सिंचाई: पानी की बचत और ज्यादा उत्पादन
टपक सिंचाई तकनीक में पाइप से बूंद-बूंद पानी पौधों की जड़ों तक पहुंचाया जाता है। इससे 50-60% तक पानी की बचत होती है और बिजली-डीजल का खर्च भी घटता है। पौधे को जरूरत के मुताबिक पानी मिलने से उसकी बढ़वार अच्छी होती है और उपज बढ़ जाती है।
4. रैटून मैनेजमेंट: पेड़ी से भी बंपर फसल
पहली फसल काटने के बाद जड़ों से निकलने वाली दूसरी फसल को रैटून कहते हैं। किसान अक्सर इसे नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि सही प्रबंधन से यह फसल भी मुनाफा दे सकती है। ठूंठ की सही कटाई, खाली जगह में नई पौध लगाना और समय पर खाद-पानी देने से पेड़ी की पैदावार 10-15% तक बढ़ाई जा सकती है।
5. ट्रैश मल्चर का उपयोग: खेत बने उपजाऊ
गन्ने की कटाई के बाद खेत में बची सूखी पत्तियों को अक्सर किसान जला देते हैं, जिससे प्रदूषण और मिट्टी की क्षति होती है। ट्रैश मल्चर मशीन इन पत्तियों को काटकर खेत में ही फैला देती है। ये पत्तियां धीरे-धीरे सड़कर जैविक खाद बनती हैं और मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती हैं। साथ ही, मिट्टी की नमी भी बनी रहती है जिससे सिंचाई की जरूरत कम पड़ती है।
“पंचामृत” तकनीक गन्ना किसानों के लिए वरदान साबित हो सकती है। इससे पैदावार बढ़ाने के साथ-साथ लागत घटती है और खेती टिकाऊ व पर्यावरण अनुकूल बनती है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर किसान इन वैज्ञानिक तरीकों को अपनाते हैं, तो वे न सिर्फ अपनी आय बढ़ा सकते हैं बल्कि भारत को चीनी उत्पादन में और अधिक आत्मनिर्भर बना सकते हैं।
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