नई दिल्ली: देश में खाद्यान्न के रिकॉर्ड उत्पादन होने के बावजूद केंद्र सरकार फिलहाल गेहूं निर्यात खोलने के पक्ष में नहीं है। सरकार खाद्य सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए संभावित खाद संकट, बढ़ती उर्वरक कीमतों और कमजोर मॉनसून की आशंका को ध्यान में रखकर सतर्क नीति अपना रही है। साल 2025-26 में भारत ने 376.56 मिलियन टन खाद्यान्न उत्पादन का रिकॉर्ड बनाया है, लेकिन आगामी 2026-27 फसल वर्ष के लिए उत्पादन लक्ष्य घटाकर 373.93 मिलियन टन निर्धारित किया गया है। इसमें चावल के लिए 151 मिलियन टन और गेहूं के लिए 121.5 मिलियन टन का लक्ष्य तय किया गया है।
उत्पादन लक्ष्य में सतर्कता का संकेत
सरकार ने दालों के लिए 28.42 मिलियन टन, मोटे अनाज के लिए 18.08 मिलियन टन और मक्के के लिए 52.50 मिलियन टन का लक्ष्य रखा है। चावल और मक्के के लिए उत्पादन से कम लक्ष्य निर्धारित करना एक सावधानी भरा कदम माना जा रहा है, क्योंकि इस साल सामान्य से कम बारिश की संभावना जताई गई है।
मॉनसून और मौसम का बढ़ता खतरा
मौसम विभाग ने इस वर्ष औसत से कम वर्षा का अनुमान लगाया है, जिससे मॉनसून कमजोर रह सकता है। अल नीनो के प्रभाव के चलते चावल और मक्का जैसी फसलों पर असर पड़ने की आशंका है। ऐसे में सरकार ने पहले से ही रणनीति बनाकर जोखिम को कम करने की तैयारी शुरू कर दी है।
गेहूं से पूरी होगी कमी की भरपाई
विशेषज्ञों का मानना है कि उर्वरकों की बढ़ती कीमतों के कारण चावल उत्पादन प्रभावित हो सकता है। ऐसी स्थिति में गेहूं को विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। यही वजह है कि सरकार घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए गेहूं का पर्याप्त भंडार बनाए रखना चाहती है और निर्यात पर सख्त रुख अपना रही है।
महंगाई और वैश्विक हालात का असर
वैश्विक स्तर पर बढ़ती महंगाई और आपूर्ति श्रृंखला में बाधाओं के कारण खाद्य संकट की आशंका जताई जा रही है। इसका असर भारत पर भी पड़ सकता है। सरकार खाद्य वस्तुओं की कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए निर्यात नीति को संतुलित और सावधानीपूर्वक लागू कर रही है। कुल मिलाकर, सरकार का फोकस देश की खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करना है। यही कारण है कि रिकॉर्ड उत्पादन के बावजूद गेहूं निर्यात पर फिलहाल रोक जारी रखने की संभावना बनी हुई है।
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