Site icon Agriculture| Kheti| Krishi| Farm| Farmer| Agriculture| News

गोबर से कमाई का नया रास्ता, पशुपालकों की आय बढ़ाने की पहल

Earning from cow dung

नई दिल्ली: देश में अब गोबर को बेकार समझकर फेंकने की बजाय उसे आय के महत्वपूर्ण साधन के रूप में अपनाया जा रहा है। पशुपालन क्षेत्र में गोबर से बनने वाले उत्पादों के माध्यम से पशुपालकों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हो रही है। विशेषज्ञों के अनुसार गोबर का दोहरा उपयोग करने से पशुपालकों की कमाई में काफी बढ़ोतरी देखी जा रही है। अब पशुपालक दूध के साथ-साथ गोबर से कमाई कर रहे हैं और बाजार में गोबर से बने उत्पादों की मांग बढ़ रही है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी गोबर से होने वाली आय और इसके उपयोग को बढ़ावा देने की बात कर चुके हैं। वहीं राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. मीनेश शाह का कहना है कि गोबर अब ऊर्जा और उर्वरक का प्रभावी विकल्प बनकर उभर रहा है। इससे न केवल किसानों की आय बढ़ रही है बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिल रही है।

गोबर से बन रहे कई तरह के उत्पाद

गोबर से अब केवल खाद ही नहीं बल्कि कई प्रकार के उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। इसके लिए राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड ने तीन अलग-अलग मॉडल विकसित किए हैं। इन मॉडलों के माध्यम से गोबर का बेहतर उपयोग कर किसानों और पशुपालकों की आय बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। इन मॉडलों के सफल संचालन से एक ओर जहां किसानों की आय में वृद्धि हो रही है, वहीं दूसरी ओर मिट्टी की सेहत में सुधार और पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिल रहा है। गोबर से बनने वाले उत्पादों का उपयोग ऊर्जा उत्पादन, जैविक उर्वरक और अन्य उपयोगी संसाधनों के रूप में किया जा रहा है।

15 राज्यों में शुरू की जाएगी पहल

राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. मीनेश शाह के अनुसार देश के 15 राज्यों के विभिन्न दुग्ध महासंघों और संघों के साथ कुल 25 समझौते किए गए हैं। इन समझौतों के तहत जकरियापुरा, वाराणसी और बनास जैसे मॉडलों पर काम किया जाएगा। इन मॉडलों के माध्यम से डेयरी क्षेत्र को टिकाऊ और संसाधनों के पुनः उपयोग की दिशा में आगे बढ़ाया जाएगा। इसके साथ ही कई नए विकेंद्रीकृत और केंद्रीकृत बायोगैस संयंत्र भी स्थापित किए जाएंगे। यह पहल बहुआयामी लाभ देने वाली मानी जा रही है, जिससे किसानों की आय बढ़ेगी और पर्यावरण को भी लाभ मिलेगा।

ऐसे काम करता है गोबर आधारित मॉडल

गोबर आधारित इस व्यवस्था में किसानों को कई तरह के लाभ मिलते हैं। गोबर से बायोगैस तैयार की जाती है, जिसका उपयोग घरेलू ईंधन के रूप में किया जा सकता है। बायोगैस उत्पादन के बाद बचने वाली स्लरी खेतों में उर्वरक के रूप में उपयोग की जाती है, जिससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है। जरूरत से अधिक बची स्लरी को किसान बाजार में बेच भी सकते हैं, जिससे उन्हें अतिरिक्त आय प्राप्त होती है। इस तरह यह व्यवस्था किसानों को अतिरिक्त कमाई के साथ-साथ जैविक उर्वरक उपलब्ध कराती है और पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान देती है।

तीन मॉडल से बढ़ रही किसानों की आय

राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड ने गोबर आधारित तीन प्रमुख मॉडल विकसित किए हैं। जकरियापुरा मॉडल के तहत किसानों के घरों में रसोई ईंधन और खेतों के लिए जैविक उर्वरक उपलब्ध कराया जाता है। वाराणसी मॉडल डेयरी संचालन के लिए ऊर्जा और जैविक उर्वरक उपलब्ध कराने पर आधारित है। वहीं बनास मॉडल के माध्यम से केंद्रीकृत स्तर पर बायो-सीबीजी और जैविक उर्वरक का उत्पादन किया जा रहा है। इन तीनों मॉडलों के सफल क्रियान्वयन से पशुपालकों और किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ टिकाऊ कृषि व्यवस्था को भी मजबूती मिल रही है।

ये भी पढ़ें: दलहन किसानों के हितों के लिए सुप्रीम कोर्ट सख्त, सरकार से मांगी रिपोर्ट

Exit mobile version