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कम बारिश में खेती के नए उपाय, किसानों को फसल चयन की सलाह

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नई दिल्ली: बदलते मौसम और सूखे की चुनौती के बीच कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को फसल चयन में सतर्कता बरतने की सलाह दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि पूरी जमीन पर अधिक पानी वाली फसलों जैसे धान की खेती करना जोखिम भरा हो सकता है। इसके बजाय कम अवधि और कम पानी में तैयार होने वाली फसलों को अपनाना ज्यादा सुरक्षित और लाभकारी रहेगा।

कम पानी वाली फसलों पर जोर

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार कम बारिश वाले इलाकों में बाजरा और ज्वार जैसी मोटे अनाज की फसलें सबसे मजबूत विकल्प हैं। वहीं मूंग और उड़द जैसी दलहनी फसलें कम समय में तैयार होकर किसानों को जल्दी लाभ देती हैं। अरहर की फसल को भी इस मौसम के लिए उपयुक्त बताया गया है, क्योंकि इसकी जड़ें गहराई तक जाकर सूखे को सहन करने में सक्षम होती हैं।

बुवाई से पहले नमी का इंतजार जरूरी

वैज्ञानिकों ने किसानों को चेतावनी दी है कि बिना पर्याप्त बारिश के जल्दबाजी में बुवाई न करें। जब तक खेत में 75 से 100 मिलीमीटर तक अच्छी बारिश न हो जाए और मिट्टी में पर्याप्त नमी न बन जाए, तब तक बुवाई टालना बेहतर है। इससे फसल खराब होने का खतरा कम होता है।

मिश्रित खेती से घटेगा जोखिम

इस समय अंतरवर्तीय खेती यानी मिश्रित खेती को सबसे प्रभावी तरीका बताया गया है। इसमें किसान एक साथ दो फसलें उगाकर जोखिम को कम कर सकते हैं। उदाहरण के तौर पर अरहर के साथ सोयाबीन या बाजरा के साथ मूंग की खेती करने से यदि एक फसल प्रभावित होती है तो दूसरी से नुकसान की भरपाई हो सकती है।

मूंग और बाजरा की खेती सबसे फायदेमंद

कम वर्षा वाले क्षेत्रों में बाजरा और मूंग की मिश्रित खेती को अत्यंत लाभकारी माना गया है। अनुसंधान के अनुसार बाजरे की चार कतारों के साथ मूंग की दो कतारें लगाने से अधिक उत्पादन मिलता है। यह प्रणाली मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के साथ-साथ उत्पादन और मुनाफा भी बढ़ाती है।

खेती के लिए जरूरी सुझाव

विशेषज्ञों ने बताया कि बुवाई का सही समय मानसून की शुरुआत के साथ जून से जुलाई के बीच होता है। फसलों के बीच उचित दूरी रखना और संतुलित मात्रा में खाद का उपयोग करना जरूरी है। अधिक नाइट्रोजन का प्रयोग मूंग की वृद्धि को प्रभावित कर सकता है, इसलिए संतुलित पोषण पर ध्यान देना चाहिए।

किसानों को मिलेगा दोहरा फायदा

मिश्रित खेती से किसानों को दोहरा लाभ मिलता है। एक ओर मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर होती है, वहीं दूसरी ओर उत्पादन और आय में भी वृद्धि होती है। इस पद्धति से खेती करने पर सूखे या मौसम की मार का असर कम पड़ता है, जिससे किसानों की आजीविका सुरक्षित बनी रहती है।

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