नई दिल्ली: बेहतर फसल उत्पादन और खेती में मुनाफा कमाने के लिए समय पर जरूरी पोषक तत्वों की पूर्ति बेहद अहम होती है। लेकिन केवल पोषक तत्व देना ही काफी नहीं है, यह भी जानना जरूरी है कि इन्हें कब और कैसे दिया जाए ताकि किसान अपनी मेहनत और खर्च का पूरा लाभ उठा सकें। इन दिनों किसान धान की रोपाई कर रहे हैं, ऐसे में डीएपी (डाय-अमोनियम फॉस्फेट) के इस्तेमाल को लेकर विशेष सावधानी की जरूरत है।
डीएपी का सही इस्तेमाल क्यों है जरूरी?
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, उत्तर भारत में धान की रोपाई 20 जून के बाद शुरू हो जाती है। इस समय किसान डीएपी और नाइट्रोजन जैसे उर्वरकों का उपयोग करते हैं ताकि फसल की बेहतर ग्रोथ और अधिक पैदावार हो सके। लेकिन अक्सर किसान डीएपी का सही समय और तरीका नहीं अपनाते, जिससे उन्हें अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता है।
कब करते हैं किसान गलती?
आमतौर पर किसान धान की रोपाई के लगभग एक सप्ताह बाद डीएपी का इस्तेमाल करते हैं। जबकि डीएपी के दाने काले और कठोर होते हैं, जो पानी में जल्दी घुलते नहीं हैं। इस स्थिति में जब रोपाई के बाद डीएपी डाला जाता है, तो पौधे उसे समय पर अवशोषित नहीं कर पाते। इसका नतीजा यह होता है कि किसान की लागत तो बढ़ती है, लेकिन पौधों को डीएपी का पूरा लाभ नहीं मिल पाता।
डीएपी देने का सही तरीका क्या है?
अगर किसान डीएपी का पूरा फायदा लेना चाहते हैं तो उसे धान की रोपाई से पहले खेत में देना चाहिए। जब खेत में पानी भरकर जुताई की जाती है और उसके बाद पाटा चलाया जाता है, तो उस समय डीएपी को खेत में समान रूप से बिखेरना चाहिए। फिर पाटा चलाकर खेत को समतल कर देना चाहिए। इससे डीएपी मिट्टी में अच्छी तरह मिल जाता है और पौधे इसे आसानी से अवशोषित कर पाते हैं।
किसानों को क्या मिलेगा फायदा?
इस विधि से पौधों को शुरुआती अवस्था में ही पर्याप्त पोषक तत्व मिलते हैं जिससे उनकी जड़ें मजबूत होती हैं, फसल की बढ़वार बेहतर होती है और अंततः उपज भी अच्छी मिलती है। साथ ही, किसानों को डीएपी पर किया गया खर्च भी पूरी तरह वसूल हो पाता है। कृषि विशेषज्ञों की मानें तो किसानों को उर्वरकों के इस्तेमाल में सावधानी बरतनी चाहिए और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाना चाहिए। सही समय पर सही तकनीक अपनाने से खेती की लागत घटेगी और उत्पादन में बढ़ोतरी होगी।

