नई दिल्ली: बदलते मौसम व तापमान में उतार-चढ़ाव और बढ़ती नमी के बीच कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को सतर्क रहने की सलाह दी है। खेती के जानकारों का कहना है कि ऐसे मौसम में गेहूं और सरसों की खड़ी फसलों में फंगल और वायरल बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ जाता है। यदि समय रहते रोकथाम के उपाय नहीं किए गए तो पैदावार पर गंभीर असर पड़ सकता है।
गेहूं की फसल पर रतुआ का खतरा
कृषि विभाग के अनुसार, बदलते मौसम में गेहूं में खासतौर पर पीला रतुआ (येलो रस्ट), लीफ ब्लाइट और पाउडरी मिल्ड्यू के लक्षणों पर नजर रखना बेहद जरूरी है। विशेषज्ञों का कहना है कि रतुआ रोग शुरुआत में खेत में 10-15 पौधों पर गोल घेरे के रूप में दिखाई देता है और बाद में पूरे खेत में फैल सकता है। इसलिए किसानों को नियमित रूप से खेत का निरीक्षण करना चाहिए।
वैज्ञानिकों के मुताबिक:
- पीला रतुआ के लिए 10-20 डिग्री सेल्सियस तापमान उपयुक्त है। 25 डिग्री से अधिक तापमान होने पर इसका फैलाव रुक जाता है।
- भूरा रतुआ 15-25 डिग्री सेल्सियस तापमान और नमी युक्त जलवायु में फैलता है।
- काला रतुआ 20 डिग्री सेल्सियस से ऊपर और शुष्क वातावरण में पनपता है।
ऐसे तापमान की स्थिति में किसानों को विशेष सतर्कता बरतने की जरूरत है।
पीला रतुआ से बचाव के उपाय
विशेषज्ञों ने गेहूं को पीला रतुआ से बचाने के लिए निम्न उपाय सुझाए हैं:
- रोग की पुष्टि होते ही फफूंदनाशक दवा का प्रयोग करें।
- 500 ग्राम जिंक सल्फेट और 2 किलोग्राम यूरिया को 100 लीटर पानी में मिलाकर पौन एकड़ में छिड़काव करें।
- 200 मिलीलीटर प्रोपकोनाजोल को 200 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
- मैन्कोजेब या दीथाने एम-45 का प्रयोग करें। जरूरत पड़ने पर 10 दिन बाद दोबारा छिड़काव करें।
- दवा छिड़काव के दौरान कपड़ों पर पीला पाउडर लग जाए तो उन्हीं कपड़ों में दूसरे खेत में न जाएं, वरना संक्रमण फैल सकता है।
- संक्रमित खेत के बीज का उपयोग अगले वर्ष बुवाई में न करें।
विशेषज्ञों ने बताया कि एचडी 2967, एचडी 2851 और डब्ल्यूएच 711 किस्मों में पीला रतुआ की आशंका अधिक रहती है, जबकि डब्ल्यूएच 157, डब्ल्यूएच 283, डब्ल्यूएच 542 और डब्ल्यूएच 896 किस्में अपेक्षाकृत कम प्रभावित होती हैं।
सरसों की फसल में भी बढ़ा खतरा
इसी तरह सरसों उगाने वाले किसानों को व्हाइट रस्ट और डाउनी मिल्ड्यू जैसी बीमारियों से सावधान रहने को कहा गया है। ये बीमारियां पत्तियों और फलियों को नुकसान पहुंचाकर उत्पादन घटा सकती हैं।
संतुलित खाद और सिंचाई पर जोर
कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को खेत की साफ-सफाई बनाए रखने, संतुलित मात्रा में खाद का उपयोग करने और जरूरत के अनुसार कीटनाशकों का छिड़काव करने की सलाह दी है। बादल वाले मौसम में अधिक सिंचाई से बचने को कहा गया है, क्योंकि ज्यादा नमी से रोग तेजी से फैलते हैं।
किसानों को यह भी सलाह दी गई है कि किसी भी रसायन का इस्तेमाल करने से पहले स्थानीय कृषि अधिकारियों से संपर्क कर सही मात्रा और विधि की जानकारी जरूर लें। समय पर निगरानी और उचित प्रबंधन से फसलों को बीमारियों से बचाकर बेहतर उत्पादन सुनिश्चित किया जा सकता है।
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