भोपाल: मध्य प्रदेश के बासमती चावल को भौगोलिक संकेतक मान्यता से बाहर रखने का मुद्दा अब राजनीतिक रूप से भी तेज होता जा रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री और राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह ने केंद्र सरकार पर राज्य के किसानों के साथ भेदभाव का आरोप लगाते हुए चेतावनी दी है कि यदि मध्य प्रदेश के किसानों को इसका लाभ नहीं मिला तो वह अनशन पर बैठने के लिए मजबूर होंगे। उन्होंने इस मामले के समाधान के लिए केंद्र और राज्य सरकार को जून तक का समय दिया है।
भोपाल में पत्रकारों से बातचीत करते हुए दिग्विजय सिंह ने कहा कि मध्य प्रदेश के किसान लंबे समय से इस मुद्दे पर न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि राज्य में कई वर्षों से बासमती धान की खेती हो रही है और यहां पैदा होने वाला चावल अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी अच्छी पहचान रखता है। इसके बावजूद किसानों को भौगोलिक संकेतक मान्यता से मिलने वाले लाभ नहीं मिल पा रहे हैं।
फैसलों में मध्य प्रदेश की अनदेखी का आरोप
दिग्विजय सिंह ने कहा कि बासमती चावल एक ऐसा कृषि उत्पाद है जिसकी वैश्विक बाजार में हमेशा मजबूत मांग रहती है। सामान्य चावल की तुलना में इसकी कीमत भी काफी अधिक होती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में बासमती की कीमत लगभग 304 डॉलर प्रति क्विंटल तक पहुंच जाती है, जिससे इसकी आर्थिक अहमियत साफ दिखाई देती है। उन्होंने आरोप लगाया कि भौगोलिक संकेतक से जुड़े फैसलों में मध्य प्रदेश की अनदेखी की गई है।
उत्तर प्रदेश की किस्मों को मिली मान्यता
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि पहले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के दौरान बासमती की कुछ किस्मों को भौगोलिक संकेतक मान्यता दी गई थी। बाद में वर्तमान व्यवस्था में बदलाव हुआ और उत्तर प्रदेश की 19 किस्मों को यह मान्यता प्रदान कर दी गई। उन्होंने कहा कि इसके बावजूद मध्य प्रदेश के किसानों को अब तक इस दायरे में शामिल नहीं किया गया है। उनके अनुसार यह स्थिति न केवल राज्य के किसानों के लिए नुकसानदायक है, बल्कि देश के बासमती निर्यात पर भी असर डाल सकती है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में जरूरी मान्यता
दिग्विजय सिंह ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत को पाकिस्तान से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है। ऐसे में बासमती उत्पादन वाले सभी क्षेत्रों को उचित मान्यता मिलना जरूरी है। उन्होंने बताया कि उषा-1 और 1121 जैसी बासमती किस्में मध्य प्रदेश के कई हिस्सों में व्यापक रूप से उगाई जाती हैं और इनकी अंतरराष्ट्रीय बाजार में अच्छी मांग है। उन्होंने कहा कि यदि इन किस्मों को भौगोलिक संकेतक के दायरे में शामिल नहीं किया गया तो किसानों को उचित मूल्य और पहचान मिलने में कठिनाई हो सकती है।
प्रधानमंत्री को लिखा पत्र
दिग्विजय सिंह ने बताया कि उन्होंने इस विषय पर 7 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर मध्य प्रदेश के किसानों को भौगोलिक संकेतक मान्यता का लाभ दिलाने की मांग की है। इसके साथ ही उन्होंने केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान से भी इस मामले में हस्तक्षेप करने की अपील की है। उन्होंने कहा कि विदिशा लोकसभा क्षेत्र सहित राज्य के कई हिस्सों में बड़ी संख्या में किसान बासमती धान की खेती कर रहे हैं। ऐसे में यह समझ से परे है कि उन्हें भौगोलिक संकेतक के दायरे से बाहर क्यों रखा गया है।
जून तक समाधान नहीं हुआ तो आंदोलन
दिग्विजय सिंह ने स्पष्ट किया कि यदि जून तक इस मुद्दे का समाधान नहीं हुआ और किसानों को भौगोलिक संकेतक मान्यता का लाभ नहीं मिला तो वह आंदोलन का रास्ता अपनाने से पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ने पर वह किसानों के समर्थन में अनशन पर भी बैठ सकते हैं। इस दौरान उन्होंने अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर भी संकेत दिए। उन्होंने कहा कि राज्यसभा की अपनी दूसरी अवधि पूरी होने के बाद वह आगे संसद की राजनीति में सक्रिय नहीं रहेंगे, लेकिन कांग्रेस के लिए काम करते रहेंगे।
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