नई दिल्ली: राजधानी के जंतर मंतर पर सोमवार को संयुक्त किसान मोर्चा ने मजदूर किसान संसद का आयोजन किया, जिसमें किसानों और मजदूरों से जुड़े अनेक संगठनों ने भाग लेकर केंद्र सरकार की आर्थिक और श्रम नीतियों पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। संयुक्त किसान मोर्चा और केंद्रीय श्रमिक संगठनों के संयुक्त मंच की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में सरकार से उद्योग समूहों के पक्ष में बताई जा रही और विदेशी प्रभाव वाली नीतियों को छोड़ने की मांग की गई। संगठनों ने चेतावनी दी कि यदि इन नीतियों को वापस नहीं लिया गया तो देशभर में लंबे समय तक संयुक्त आंदोलन चलाए जाएंगे।
23 मार्च और 1 अप्रैल को बड़े कार्यक्रमों का ऐलान
सभा में मौजूद किसान और मजदूर संगठनों के नेताओं ने कहा कि किसानों और श्रमिकों को बड़े पैमाने पर संघर्ष के लिए तैयार रहना होगा। इसके तहत 23 मार्च 2026 को शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के शहादत दिवस पर साम्राज्यवाद विरोधी दिवस मनाने का आह्वान किया गया। इसके साथ ही 1 अप्रैल 2026 को चार श्रम संहिताओं के विरोध में पूरे देश में राष्ट्रव्यापी काला दिवस मनाने की घोषणा की गई। इसके अलावा विभिन्न राज्यों में महापंचायतों का आयोजन कर उद्योग समूहों के विरोध में जनसंघर्ष को तेज करने की भी बात कही गई।
सरकार पर विदेशी दबाव में फैसले लेने का आरोप
मजदूर किसान संसद का आयोजन संसद सत्र के समानांतर राष्ट्रीय राजधानी में किया गया। इसमें केंद्रीय श्रमिक संगठनों, विभिन्न क्षेत्रीय महासंघों और किसान संगठनों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। वक्ताओं ने 12 फरवरी 2026 को हुई देशव्यापी आम हड़ताल को मजदूरों और किसानों की नीतियों के खिलाफ एक मजबूत चेतावनी बताया।
किसान और मजदूर संगठनों ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार विदेशी दबाव में असमान और शोषणकारी अंतरिम व्यापार ढांचे को स्वीकार कर रही है। वक्ताओं ने सरकार से इस समझौते को खारिज करने और व्यापार मामलों में विदेशी दबाव के आगे न झुकने की अपील की। साथ ही ईरान में चल रहे युद्ध को रोकने और विश्व शांति बनाए रखने की भी मांग की गई।
कृषि निर्यात और कामगारों की सुरक्षा का मुद्दा
सभा में खाड़ी देशों में काम कर रहे भारतीय कामगारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग भी उठाई गई। इसके अलावा खाड़ी देशों को होने वाले कृषि निर्यात पर विशेष मुआवजा देने की मांग की गई, ताकि किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य मिल सके। मजदूर किसान संसद ने वर्ष 2021 के किसान आंदोलन के दौरान संयुक्त किसान मोर्चा को दिए गए लिखित आश्वासनों को लागू न करने के लिए भी केंद्र सरकार की आलोचना की।
सभी फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य कानून की मांग
सभा की घोषणा में संसद से मांग की गई कि सभी फसलों की खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य के आधार पर सुनिश्चित करने के लिए कानून बनाया जाए। साथ ही न्यूनतम समर्थन मूल्य की गणना कुल लागत पर पचास प्रतिशत लाभ जोड़कर की जाए। इसके अलावा कृषि के आधुनिकीकरण को उत्पादक सहकारिताओं और सार्वजनिक क्षेत्र के कृषि आधारित उद्योगों के माध्यम से बढ़ावा देने तथा कृषि में उद्योग समूहों के दखल को समाप्त करने की मांग भी की गई। किसान नेताओं ने कहा कि मूल्य संवर्धन से होने वाले लाभ में प्राथमिक उत्पादकों की हिस्सेदारी भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
चार श्रम संहिताओं का विरोध
सभा में चारों श्रम संहिताओं का भी विरोध किया गया। संगठनों का कहना है कि इन कानूनों से श्रमिकों के संगठन बनाने, सामूहिक बातचीत करने, हड़ताल करने और आठ घंटे काम के अधिकार जैसे कई अधिकार कमजोर हो सकते हैं। संगठनों ने चेतावनी दी कि यदि इन कानूनों को लागू किया गया तो मजदूर और किसान संयुक्त रूप से बड़ा आंदोलन करेंगे। इसके साथ ही केंद्र सरकार से बिजली संशोधन विधेयक और बीज विधेयक 2025 को वापस लेने, ग्राम से जुड़े कुछ प्रावधानों को निरस्त करने तथा ग्रामीण रोजगार योजना को मजबूत करने की मांग भी की गई।
राज्यों के वित्तीय अधिकारों का मुद्दा भी उठा
सभा में राज्यों के वित्तीय अधिकारों को लेकर भी चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि वस्तु और सेवा कर व्यवस्था लागू होने के बाद राज्यों की कराधान शक्तियां सीमित हो गई हैं। इसलिए इस कानून में संशोधन कर राज्यों की कराधान शक्तियों को बहाल किया जाए और विभाज्य कर पूल में राज्यों की हिस्सेदारी मौजूदा 33 प्रतिशत के बजाय 60 प्रतिशत की जाए।
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