नई दिल्ली: एशिया के कई देशों में सूखा और सामान्य से कम बारिश की स्थिति ने खेती को लेकर चिंता बढ़ा दी है। सबसे ज्यादा नजर भारत पर टिकी है, क्योंकि यहां की कृषि व्यवस्था बड़े पैमाने पर मॉनसून पर निर्भर करती है। बढ़ते तापमान और कमजोर बारिश के कारण कई क्षेत्रों में खेती की तैयारियां प्रभावित हो रही हैं। मौसम विभाग के अनुसार इस वर्ष मॉनसून सामान्य से कम रहने की संभावना है, जिससे खरीफ सीजन की बुवाई पर असर पड़ सकता है। देश में वार्षिक वर्षा का बड़ा हिस्सा मॉनसून से आता है और इसी पर धान, सोयाबीन, दालें, गन्ना और मक्का जैसी प्रमुख फसलों की खेती निर्भर करती है।
बुवाई पर पड़ सकता है सीधा असर
विशेषज्ञों का कहना है कि मॉनसून की देरी से शुरुआत होने पर बुवाई का समय आगे खिसक सकता है। इसके साथ ही अगर बारिश के बीच लंबे सूखे अंतराल आते हैं, तो फसलों के विकास पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। इससे उत्पादन घटने और बाजार में अस्थिरता बढ़ने की आशंका है।
एशिया के अन्य देशों में भी संकट
यह समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है। थाईलैंड, इंडोनेशिया और अन्य एशियाई देशों में भी बारिश की कमी के कारण खेती प्रभावित हो रही है। कई क्षेत्रों में किसान दूसरी फसल लेने को लेकर असमंजस में हैं, क्योंकि पानी की उपलब्धता अनिश्चित बनी हुई है।
वैश्विक बाजार में बढ़ी हलचल
खेती को लेकर बढ़ती चिंताओं का असर अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर भी दिखने लगा है। गेहूं और चावल की कीमतों में तेजी दर्ज की जा रही है। व्यापारियों का मानना है कि भविष्य में आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता के कारण बाजार में बेचैनी बढ़ रही है।
खाद और लागत का दबाव
किसानों पर पहले से ही खाद और ईंधन की लागत का दबाव बना हुआ है। यदि बारिश कम होती है और खाद की कमी गहराती है, तो उत्पादन पर और अधिक असर पड़ सकता है। इससे खाद्य सुरक्षा को लेकर भी चुनौतियां बढ़ सकती हैं।
आगे और बढ़ सकता है असर
विशेषज्ञों का मानना है कि अल नीनो का प्रभाव धीरे-धीरे व्यापक हो सकता है और इसका असर एशिया के साथ-साथ दुनिया के अन्य हिस्सों में भी दिखाई दे सकता है। आने वाले महीनों में मौसम के बदलाव कृषि उत्पादन और बाजार की दिशा तय करेंगे। कमजोर मॉनसून और बढ़ते तापमान की स्थिति ने भारत सहित पूरे एशिया में कृषि क्षेत्र के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं, जिससे किसानों और बाजार दोनों की चिंता बढ़ गई है।
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