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पंजाब में पराली जलाने की 1,612 घटनाएं, तरनतारन सबसे आगे

1,612 stubble burning incidents in Punjab, Tarn Taran leads

चंडीगढ़: पंजाब में प्रशासन और पुलिस की सख्ती के बावजूद धान की पराली जलाने की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की 2 नवंबर 2026 तक की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में पराली जलाने की कुल 1,612 घटनाएं दर्ज की गई हैं। इन मामलों में 29 लाख 15 हजार रुपये का पर्यावरणीय जुर्माना लगाया गया है, जिसमें से 19 लाख रुपये की वसूली हो चुकी है। तरनतारन जिले में सबसे अधिक घटनाएं सामने आई हैं। वहीं, मोगा में पराली से उठने वाले धुएं के कारण वायु प्रदूषण की स्थिति गंभीर होती जा रही है। स्थानीय रिपोर्टों के मुताबिक, शाम करीब 4 बजे ही धुएं की मोटी परत के कारण आसमान में अंधेरा छाने लगता है।

तरनतारन में पराली जलाने की सबसे ज्यादा घटनाएं

पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में पराली जलाने की घटनाओं के संबंध में 1,380 खेतों का निरीक्षण किया गया। इनमें 663 स्थानों पर पराली जलाने की पुष्टि हुई है। पर्यावरणीय मुआवजे के तहत 573 मामलों में कार्रवाई की गई है। इसके अलावा, राज्य में 423 प्राथमिकी दर्ज की गई हैं, जबकि 472 मामलों में संबंधित किसानों के राजस्व रिकॉर्ड में रेड एंट्री की गई है। अधिकारियों की ओर से 572 चेतावनी और कारण बताओ नोटिस भी जारी किए गए हैं।

तरनतारन में 489 घटनाएं दर्ज

जिलावार आंकड़ों में तरनतारन 489 घटनाओं के साथ पहले स्थान पर है। यहां 466 खेतों का निरीक्षण किया गया, जिनमें 258 स्थानों पर पराली जलाने की पुष्टि हुई। जिले में 258 प्राथमिकी दर्ज की गई हैं। वहीं, 258 मामलों में कुल 13.10 लाख रुपये का पर्यावरणीय जुर्माना लगाया गया और पूरी राशि की वसूली कर ली गई है। अन्य जिलों में अमृतसर में 192, फिरोजपुर में 186 और गुरदासपुर में 100 घटनाएं दर्ज की गई हैं। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि सीमावर्ती और कृषि प्रधान जिलों में पराली जलाने पर नियंत्रण करना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।

मोगा में धुएं से बिगड़ रहे हालात

मोगा जिले में भी धान की पराली जलाने की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। मोगा शहर और आसपास के गांवों में खेतों से उठने वाला धुआं वातावरण में फैल रहा है। स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, कुछ इलाकों में शाम करीब 4 बजे ही धुएं की मोटी परत के कारण आसमान में अंधेरा छाने लगता है। इससे लोगों को सांस लेने में परेशानी होने की शिकायतें सामने आ रही हैं और वायु गुणवत्ता पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है।

देर शाम खेतों में आग लगाने के आरोप

स्थानीय रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कुछ किसान देर शाम खेतों में पराली जला रहे हैं, ताकि उपग्रह तस्वीरों में आग की घटनाएं दर्ज होने की संभावना कम हो। एक जमीनी रिपोर्ट में एक दिन के दौरान 100 से अधिक किसानों द्वारा खेतों में आग लगाने का दावा भी किया गया है। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। स्थानीय स्तर पर सामने आ रही शिकायतों और प्रशासनिक आंकड़ों के बीच अंतर को लेकर निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं।

फिरोजपुर में पिछले दिनों बढ़ीं घटनाएं

फिरोजपुर जिले में अब तक पराली जलाने की 186 घटनाएं दर्ज की गई हैं। अधिकारियों के अनुसार, पिछले तीन से चार दिनों में ऐसे मामलों में बढ़ोतरी हुई है। अतिरिक्त उपायुक्त कृष्णा पाल राजपूत और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक भूपेंद्र सिंह सिद्धू ने किसानों से पराली नहीं जलाने की अपील की है। अधिकारियों का कहना है कि प्रशासन और पुलिस की टीमें लगातार खेतों में निगरानी कर रही हैं। जहां पराली जलाने की सूचना मिलती है, वहां पहुंचकर आग बुझाने और मामले की जांच करने के बाद प्राथमिकी दर्ज करने तथा राजस्व रिकॉर्ड में रेड एंट्री करने जैसी कार्रवाई की जा रही है।

पराली जलाने पर अधिकारियों की जवाबदेही भी तय

पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट में 78 ऐसे खेतों का भी उल्लेख है, जहां गैर-एएफएल श्रेणी के तहत पराली जलाने के निशान पाए गए। इसके अलावा, पराली जलाने की घटनाओं के संबंध में संबंधित अधिकारियों के खिलाफ 13 मामलों में अभियोजन की कार्रवाई शुरू की गई है। हालांकि, रिपोर्ट के अनुसार अब तक किसी अधिकारी को आरोपपत्र जारी करने या निलंबित करने का मामला दर्ज नहीं हुआ है।

जुर्माने और प्राथमिकी के बावजूद चुनौती बरकरार

पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए पर्यावरणीय जुर्माना, प्राथमिकी, राजस्व रिकॉर्ड में रेड एंट्री और खेतों की निगरानी जैसे कदम उठाए जा रहे हैं। इसके बावजूद 2 नवंबर तक 1,612 घटनाएं दर्ज होना बताता है कि समस्या पर पूरी तरह नियंत्रण नहीं हो पाया है। पराली के धुएं से स्थानीय वायु गुणवत्ता प्रभावित होने के साथ-साथ आसपास रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य पर भी खतरा बढ़ सकता है। ऐसे में प्रशासन के सामने किसानों को पराली प्रबंधन के वैकल्पिक तरीके उपलब्ध कराने, निगरानी को प्रभावी बनाने और नियमों का पालन सुनिश्चित करने की दोहरी चुनौती है।

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