नई दिल्ली: उत्तर भारत में सर्दियों की शुरुआत के साथ ही पराली जलाने की घटनाओं को लेकर केंद्र सरकार ने निगरानी व्यवस्था सख्त करने का फैसला किया है। दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु प्रदूषण की चुनौती के बीच सरकार अब केवल उपग्रहों से मिलने वाले आंकड़ों पर निर्भर रहने के बजाय खेतों में प्रत्यक्ष निरीक्षण और स्थानीय स्तर पर निगरानी को भी मजबूत करेगी। निगरानी रिपोर्टों के अनुसार, कुछ मामलों में किसान दोपहर तीन बजे के बाद खेतों में पराली जला रहे हैं, जिससे आग की घटनाओं का पता लगाने में कठिनाई हो सकती है। इसी को ध्यान में रखते हुए राज्यों और जिला प्रशासनों को विशेष सतर्कता बरतने के निर्देश दिए गए हैं। पंजाब और हरियाणा के उन जिलों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, जहां धान की कटाई के बाद पराली जलाने की घटनाएं सामने आने की आशंका अधिक रहती है। सरकार का उद्देश्य खेतों में आग लगाने की घटनाओं को शुरुआती स्तर पर रोकना और सर्दियों में प्रदूषण की समस्या को बढ़ने से बचाना है।
पराली जलाने की घटनाओं पर निगरानी होगी सख्त
केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने मंगलवार को हुई संयुक्त समीक्षा बैठक में राज्यों को पराली जलाने की घटनाओं पर कड़ी नजर रखने के निर्देश दिए। बैठक में विशेष रूप से दोपहर तीन बजे के बाद खेतों में लगाई जाने वाली आग की निगरानी बढ़ाने पर जोर दिया गया। बताया गया है कि कुछ परिस्थितियों में इस समय के बाद होने वाली आग की घटनाएं उपग्रह आधारित निगरानी में दर्ज नहीं हो पाती हैं। ऐसे में केवल उपग्रहों से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर पराली जलाने की वास्तविक स्थिति का आकलन करना पर्याप्त नहीं हो सकता। सरकार चाहती है कि निगरानी व्यवस्था में प्रत्यक्ष निरीक्षण, स्थानीय प्रशासन की सक्रियता और समय पर कार्रवाई को भी शामिल किया जाए। इससे उन घटनाओं का पता लगाने में मदद मिल सकती है, जो नियमित निगरानी के दौरान छूट जाती हैं।
पंजाब और हरियाणा के दस जिलों पर विशेष ध्यान
केंद्र सरकार ने पंजाब और हरियाणा के उन जिलों में निगरानी बढ़ाने के निर्देश दिए हैं, जहां धान की कटाई के बाद पराली जलाने की आशंका अधिक रहती है। पंजाब के संगरूर, तरनतारन, अमृतसर, पटियाला और गुरदासपुर पर विशेष ध्यान देने को कहा गया है। वहीं हरियाणा के कैथल, करनाल, कुरुक्षेत्र, अंबाला और फतेहाबाद जिलों में भी निगरानी मजबूत की जाएगी। इन क्षेत्रों में धान की कटाई का काम तेजी से आगे बढ़ने के साथ खेतों से फसल अवशेष हटाने की चुनौती बढ़ जाती है। यदि किसान पराली का उचित प्रबंधन करने के बजाय उसे खेत में जला देते हैं, तो उससे निकलने वाला धुआं आसपास के वातावरण को प्रभावित कर सकता है। इसलिए इन जिलों में समय रहते कार्रवाई करना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
केवल उपग्रह के आंकड़ों से नहीं चलेगा काम
पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार, जिला प्रशासन को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि पराली जलाने के मामलों में केवल उपग्रह से प्राप्त आंकड़ों को ही कार्रवाई का आधार न बनाया जाए। इसके साथ खेतों में प्रत्यक्ष सत्यापन और स्थानीय स्तर पर निरीक्षण को प्राथमिकता दी जाएगी। इसके लिए उड़न दस्तों, खेतों का निरीक्षण करने वाली टीमों और स्थानीय प्रशासन की गश्त बढ़ाने की व्यवस्था की जा रही है। संबंधित अधिकारियों को आग लगने की सूचना मिलने पर मौके की स्थिति की जांच करने और नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर नियमानुसार कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं। इस व्यवस्था का उद्देश्य निगरानी में आने वाली कमियों को दूर करना और पराली जलाने की घटनाओं की समय रहते पहचान करना है। सरकार की ओर से यह भी जोर दिया जा रहा है कि निगरानी के साथ किसानों को फसल अवशेषों के वैकल्पिक प्रबंधन के बारे में जानकारी दी जाए, ताकि समस्या का समाधान केवल दंडात्मक कार्रवाई तक सीमित न रहे।
पंजाब में पराली जलाने के मामलों में तेजी
पंजाब में धान की कटाई के मौजूदा मौसम के दौरान पराली जलाने की घटनाओं में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, मंगलवार को राज्य में पराली जलाने के 51 नए मामले सामने आए। यह मौजूदा धान कटाई मौसम में एक दिन के दौरान दर्ज की गई सबसे अधिक घटनाएं बताई गई हैं। इसके साथ ही राज्य में पूरे मौसम के दौरान सामने आए मामलों की कुल संख्या बढ़कर 174 हो गई। इन आंकड़ों ने राज्य प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि कटाई के मौसम में पराली जलाने की घटनाएं बढ़ने से आने वाले दिनों में प्रदूषण का दबाव और बढ़ सकता है। प्रशासन अब उन जिलों में निगरानी मजबूत करने पर ध्यान दे रहा है, जहां सबसे अधिक मामले सामने आए हैं। शुरुआती चरण में ही आग लगाने की घटनाओं पर रोक लगाने से समस्या को बड़े स्तर पर फैलने से रोकने में मदद मिल सकती है।
पराली जलाने पर कानूनी कार्रवाई और पर्यावरणीय मुआवजा
पंजाब में पराली जलाने के नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी तेज की गई है। अधिकारियों के अनुसार, भारतीय न्याय संहिता की धारा 223 के तहत 16 प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की गई हैं। इनमें 12 मामले तरनतारन, तीन अमृतसर और एक पटियाला जिले में दर्ज किए गए हैं। इसके अलावा 44 मामलों में कुल 2.30 लाख रुपये का पर्यावरणीय मुआवजा लगाया गया है, जिसमें से 1.15 लाख रुपये की वसूली की जा चुकी है। प्रशासन ने 28 मामलों में किसानों की जमीन के अभिलेखों में लाल प्रविष्टि भी दर्ज की है। इनमें तरनतारन के 15, अमृतसर के नौ और फिरोजपुर के चार मामले शामिल हैं। इन कदमों का उद्देश्य पराली जलाने की घटनाओं को रोकना और नियमों के उल्लंघन के प्रति जवाबदेही तय करना है। हालांकि, कानूनी कार्रवाई के साथ किसानों को पराली के उचित निपटारे के व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध कराना भी महत्वपूर्ण रहेगा।
शुरुआती स्तर पर रोकथाम से मिल सकती है राहत
पराली जलाने की घटनाओं में शुरुआती बढ़ोतरी को देखते हुए केंद्र और राज्य सरकारें निगरानी, जागरूकता और फसल अवशेष प्रबंधन पर जोर दे रही हैं। यदि धान की कटाई के दौरान ही खेतों में आग लगाने की घटनाओं को रोका जा सके, तो प्रदूषण बढ़ने के एक महत्वपूर्ण स्रोत पर नियंत्रण पाने में मदद मिल सकती है। इसके लिए जिला स्तर पर निगरानी दलों की सक्रियता, समय पर कार्रवाई, किसानों को मशीनों की उपलब्धता और वैकल्पिक प्रबंधन विधियों की जानकारी देना जरूरी है। साथ ही, पराली प्रबंधन से जुड़ी योजनाओं और सुविधाओं का लाभ वास्तविक जरूरत वाले किसानों तक पहुंचाना भी महत्वपूर्ण होगा।
कुल मिलाकर, पराली जलाने की घटनाओं पर केंद्र सरकार ने निगरानी सख्त करने के निर्देश दिए हैं। उपग्रह से मिलने वाले आंकड़ों के साथ अब खेतों में प्रत्यक्ष निरीक्षण और स्थानीय प्रशासन की सक्रियता बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। पंजाब में सामने आए नए मामले और कानूनी कार्रवाई इस मुद्दे की गंभीरता को रेखांकित करते हैं। आने वाले सप्ताहों में निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी रहती है और किसान वैकल्पिक फसल अवशेष प्रबंधन कितना अपनाते हैं, इसका असर दिल्ली-एनसीआर सहित उत्तर भारत की सर्दियों की वायु गुणवत्ता पर पड़ सकता है।
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