नई दिल्ली: मछली खाने का तरीका हर व्यक्ति का अलग-अलग हो सकता है, लेकिन एक बात सभी में समान होती है कि मछली हमेशा ताजी ही मिले। चाहे कोई रोज मछली खाता हो या सप्ताह में एक दिन, सभी की पहली पसंद ताजी मछली ही होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि मछली की कीमत भी उसकी ताजगी पर निर्भर करती है, इसलिए मछली पालकों की सबसे बड़ी चुनौती यही होती है कि तालाब से बाजार और फिर घर तक मछली ताजी अवस्था में पहुंचे। इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए अब मछली पालन में आधुनिक तकनीक का तेजी से उपयोग बढ़ रहा है। नई तकनीकों की मदद से मछलियों को न केवल सुरक्षित रखा जा रहा है, बल्कि उन्हें स्वस्थ अवस्था में सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंचाने की दिशा में भी काम हो रहा है। अब मछली के बीज से लेकर तैयार मछली तक की पूरी प्रक्रिया में उन्नत तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे बीमार मछलियों के बाजार में पहुंचने की संभावना काफी कम हो गई है।
ड्रोन से तालाब की निगरानी और तापमान नियंत्रण
मछली पालन के दौरान मछलियों के स्वस्थ विकास के लिए तालाब के पानी का तापमान संतुलित रहना बेहद जरूरी होता है। हर प्रजाति की मछली के लिए अलग-अलग तापमान की आवश्यकता होती है। पहले मछली पालकों को पानी का तापमान जांचने के लिए थर्मामीटर का सहारा लेना पड़ता था, लेकिन अब यह काम ड्रोन की मदद से आसान हो गया है। ड्रोन में लगे सेंसर तालाब के पानी का तापमान और उसकी गुणवत्ता की जानकारी सीधे मोबाइल या लैपटॉप तक पहुंचा देते हैं। अगर पानी में किसी प्रकार का प्रदूषण होता है, तो उसकी जानकारी भी तुरंत मिल जाती है, जिससे समय रहते सुधार किया जा सकता है।
बीमार मछलियों की पहचान और दवा का छिड़काव
ड्रोन में लगे कैमरे तालाब के ऊपर उड़ते हुए लगातार तस्वीरें भेजते रहते हैं। इससे मछलियों की गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती है और उनकी सेहत का आकलन किया जा सकता है। अगर किसी मछली में बीमारी के लक्षण दिखाई देते हैं, जैसे शरीर पर लाल धब्बे, तो उसे तुरंत पहचाना जा सकता है। इतना ही नहीं, अब दवा का छिड़काव भी ड्रोन के माध्यम से किया जा रहा है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि तालाब के हर हिस्से में दवा समान रूप से पहुंचे और कोई भी मछली उपचार से वंचित न रह जाए। यह तरीका पारंपरिक तरीकों से अधिक प्रभावी साबित हो रहा है।
सभी मछलियों तक बराबर पहुंच रहा है दाना
मछलियों को दाना खिलाने में भी अब ड्रोन की मदद ली जा रही है। पहले मछली पालक तालाब के अलग-अलग किनारों पर जाकर दाना डालते थे, लेकिन इसमें यह समस्या होती थी कि ताकतवर मछलियां ज्यादा दाना खा लेती थीं और कमजोर मछलियां पीछे रह जाती थीं। अब ड्रोन के जरिए पूरे तालाब में समान रूप से दाना फैलाया जाता है, जिससे हर मछली को पर्याप्त भोजन मिल पाता है। इससे सभी मछलियों का विकास संतुलित होता है और उत्पादन में भी वृद्धि होती है। इस तरह आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल से मछली पालन न केवल आसान हो रहा है, बल्कि इससे उत्पादन की गुणवत्ता भी बेहतर हो रही है और उपभोक्ताओं तक ताजी मछली पहुंचाने का सपना भी साकार हो रहा है।
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