नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते युद्ध (मिडिल ईस्ट युद्ध) का असर अब वैश्विक व्यापार के साथ-साथ भारत के कृषि क्षेत्र पर भी साफ दिखाई देने लगा है। इस संघर्ष के कारण अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार मार्गों में रुकावट पैदा हो गई है, जिससे भारत के कई कृषि उत्पादों का निर्यात प्रभावित हो रहा है। खासतौर पर बासमती चावल और प्याज जैसे प्रमुख कृषि उत्पादों के व्यापार पर इसका सीधा असर पड़ा है।
भारत से बड़ी मात्रा में कृषि उत्पाद पश्चिम एशिया के देशों को भेजे जाते हैं, लेकिन युद्ध की स्थिति के कारण समुद्री मार्गों पर जोखिम बढ़ गया है। कई जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है, बंदरगाहों पर माल अटक गया है और परिवहन से जुड़ी समस्याएं बढ़ गई हैं। इसके चलते निर्यात की गति धीमी पड़ गई है और कई जगहों पर पूरी तरह रुक भी गई है। इसका परिणाम यह हुआ है कि घरेलू बाजार में इन उत्पादों की आपूर्ति बढ़ने लगी है और कीमतों में गिरावट देखने को मिल रही है।
बासमती चावल के निर्यात में बड़ी बाधा
भारत दुनिया में बासमती चावल का सबसे बड़ा निर्यातक माना जाता है और इसका एक बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया के देशों में भेजा जाता है। ईरान, सऊदी अरब, इराक और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश भारत से बासमती चावल के प्रमुख खरीदार रहे हैं। हाल की परिस्थितियों में समुद्री मार्गों पर बढ़ते जोखिम और बीमा तथा माल ढुलाई लागत में वृद्धि के कारण बासमती चावल का निर्यात गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है। अनुमान है कि लगभग चार लाख टन बासमती चावल बंदरगाहों या समुद्री मार्गों में फंसा हुआ है। जहाजों की सीमित आवाजाही के कारण यह माल समय पर अपने गंतव्य तक नहीं पहुंच पा रहा है, जिससे व्यापारिक गतिविधियों में रुकावट आ गई है।
घरेलू बाजार में बढ़ी आपूर्ति, कीमतों में गिरावट
निर्यात रुकने का सीधा असर घरेलू बाजार पर पड़ रहा है। जब विदेशों में माल भेजना मुश्किल हो जाता है तो वही उत्पाद देश के भीतर अधिक मात्रा में उपलब्ध होने लगते हैं। यही स्थिति बासमती चावल के साथ भी देखने को मिल रही है। बाजार में आपूर्ति बढ़ने के कारण हाल के दिनों में बासमती चावल की कीमतों में लगभग पांच से छह प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई है। इससे किसानों और चावल मिल संचालकों दोनों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। जिन किसानों ने बेहतर कीमत की उम्मीद में बासमती की खेती की थी, उन्हें अब अपेक्षा से कम दाम मिल रहे हैं। यदि यही स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो आने वाले मौसम में बासमती की बुवाई पर भी असर पड़ सकता है।
प्याज के निर्यात पर भी पड़ा असर
युद्ध का प्रभाव केवल बासमती चावल तक सीमित नहीं है, बल्कि प्याज के निर्यात पर भी इसका असर दिखाई दे रहा है। भारत से बड़ी मात्रा में प्याज पश्चिम एशिया के देशों को भेजा जाता है और दुबई इस व्यापार का प्रमुख केंद्र माना जाता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार भारत के कुल प्याज निर्यात का लगभग बाईस प्रतिशत हिस्सा पश्चिम एशिया के देशों में जाता है। लेकिन मौजूदा युद्ध के कारण दुबई और खाड़ी देशों के बाजारों में व्यापार की गति धीमी पड़ गई है। कई जहाजों की आवाजाही रुक गई है और बंदरगाहों पर कंटेनर अटक गए हैं। बताया जा रहा है कि भारत से भेजे गए प्याज के कई कंटेनर बंदरगाहों पर फंसे हुए हैं और नए निर्यात सौदे फिलहाल रुक गए हैं।
इस स्थिति के कारण घरेलू बाजार में प्याज की आपूर्ति बढ़ गई है और कीमतों में गिरावट आ गई है। पहले जहां किसानों को प्याज का भाव लगभग चौदह से पंद्रह रुपये प्रति किलोग्राम मिल रहा था, वहीं अब कई मंडियों में कीमत घटकर नौ से दस रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई है। इसका सबसे अधिक असर महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और कर्नाटक जैसे प्रमुख प्याज उत्पादक राज्यों के किसानों पर पड़ा है।
किसानों की आय पर बढ़ता दबाव
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का एक बड़ा कृषि निर्यात बाजार खाड़ी देशों पर निर्भर करता है। यदि पश्चिम एशिया में युद्ध लंबे समय तक चलता है तो इसका प्रभाव केवल बासमती चावल और प्याज तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि अंगूर, अनार, दालें और अन्य कृषि उत्पादों के निर्यात पर भी पड़ सकता है।
जब निर्यात में रुकावट आती है तो देश के भीतर उत्पादों की अधिक आपूर्ति हो जाती है और कीमतें गिरने लगती हैं। इसका सीधा असर किसानों की आय पर पड़ता है। पहले से ही मौसम की अनिश्चितता और बढ़ती लागत से जूझ रहे किसानों के लिए यह स्थिति आर्थिक दबाव को और बढ़ा सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि हालात जल्द सामान्य नहीं होते तो भारत के कृषि निर्यात क्षेत्र को बड़ा झटका लग सकता है। ऐसे में नए बाजारों की तलाश करना और अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों को सुचारू बनाने के लिए प्रयास करना जरूरी होगा, ताकि किसानों को उनके उत्पादों का उचित मूल्य मिल सके।
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