नई दिल्ली: रबी सीजन के बाद अब ग्रीष्मकालीन यानी जायद की बुवाई ने इस बार शुरुआती बढ़त बना ली है। मूंगफली और मक्का के रकबे में इजाफे से कुल जायद क्षेत्रफल पिछले साल के मुकाबले आगे निकल गया है, जिससे कमजोर खरीफ दाल उत्पादन की आंशिक भरपाई की संभावना बन रही है। कृषि मंत्रालय की ओर से जारी ताजा आंकड़ों के मुताबिक 13 फरवरी तक जायद फसलों की बुवाई 15.18 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गई है, जो पिछले साल की समान अवधि के 14.75 लाख हेक्टेयर से करीब 3 प्रतिशत अधिक है। विशेषज्ञों का मानना है कि बेहतर जल उपलब्धता और किसानों की बढ़ती दिलचस्पी ने इस बढ़त में अहम भूमिका निभाई है।
धान का रकबा घटा, मोटे अनाज की बुवाई तेज
कृषि मंत्रालय की साप्ताहिक बुवाई रिपोर्ट के अनुसार इस बार जायद धान का रकबा 2.7 प्रतिशत घटकर 12.80 लाख हेक्टेयर रह गया है, जो पिछले साल 13.16 लाख हेक्टेयर था। इसके विपरीत मोटे अनाजों का क्षेत्रफल तेजी से बढ़ा है। मोटे अनाजों का कुल रकबा बढ़कर 82 हजार हेक्टेयर हो गया है, जबकि पिछले साल यह 50 हजार हेक्टेयर था। इनमें मक्का का रकबा 0.63 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया है, जो एक साल पहले 0.48 लाख हेक्टेयर था। ज्वार 0.03 लाख हेक्टेयर, रागी 0.09 लाख हेक्टेयर और बाजरा 0.06 लाख हेक्टेयर में बोया गया है। इससे संकेत मिलता है कि किसान जलवायु अनुकूल और कम पानी वाली फसलों की ओर रुख कर रहे हैं।
दालों के मोर्चे पर हल्की मजबूती
दालों की बुवाई में भी हल्की बढ़त दर्ज की गई है। जायद दालों का कुल रकबा 0.58 लाख हेक्टेयर रहा, जो पिछले साल 0.50 लाख हेक्टेयर था। इसमें मूंग की हिस्सेदारी सबसे अधिक 0.44 लाख हेक्टेयर रही, जबकि उड़द का रकबा 0.10 लाख हेक्टेयर दर्ज किया गया।
मध्य प्रदेश, बिहार, ओडिशा, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और गुजरात जायद दालों के प्रमुख उत्पादक राज्य हैं। जानकारों का कहना है कि जब खरीफ दाल उत्पादन कमजोर रहता है, तब जायद दालें बाजार में आपूर्ति संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। वर्ष 2025-26 में खरीफ दाल उत्पादन 7.41 मिलियन टन रहने का अनुमान है, जो 2024-25 के 7.73 मिलियन टन से कम है। ऐसे में जायद दालों से कुछ राहत की उम्मीद की जा रही है।
तिलहन की बुवाई में भी तेज बढ़ोतरी
तिलहन फसलों में इस बार उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। जायद तिलहन का कुल रकबा बढ़कर 0.99 लाख हेक्टेयर हो गया है, जो पिछले साल 0.59 लाख हेक्टेयर था। इसमें मूंगफली का रकबा 0.87 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया है, जबकि सूरजमुखी और तिल दोनों 0.06-0.06 लाख हेक्टेयर में बोए गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि खाद्य तेलों की मांग और बेहतर बाजार भाव के चलते किसानों ने तिलहन फसलों की ओर ज्यादा रुझान दिखाया है।
पांच साल का औसत और जायद का योगदान
बीते पांच वर्षों में जायद फसलों का औसत रकबा 75.37 लाख हेक्टेयर रहा है, जबकि 2024-25 में यह रिकॉर्ड 83.92 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया था। उसी वर्ष कुल खाद्यान्न उत्पादन 357.73 मिलियन टन रहा, जिसमें जायद फसलों का योगदान 19.11 मिलियन टन यानी लगभग 5.3 प्रतिशत था।
जलाशयों में बेहतर जलस्तर से मिली रफ्तार
इस बार जायद सीजन की बुवाई में तेजी की एक बड़ी वजह जलाशयों में बेहतर जलस्तर भी है। इस समय तालाबों और जलाशयों में पानी का स्तर पिछले साल की तुलना में अधिक बताया जा रहा है, जिससे सिंचाई की उपलब्धता सुधरी है। जायद फसलें रबी कटाई के बाद और खरीफ बुवाई से पहले उगाई जाती हैं। पहले इनका आंकड़ा खरीफ या रबी के साथ जोड़ा जाता था, लेकिन अब इन्हें अलग श्रेणी में दर्ज किया जा रहा है, जिससे इनके वास्तविक योगदान का आकलन अधिक स्पष्ट रूप से हो पा रहा है।
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