नई दिल्ली: देशभर में खरीफ सीजन की शुरुआत के साथ ही किसान बड़ी संख्या में सोयाबीन, मूंग और उड़द जैसी दलहनी फसलों की बुवाई में जुट गए हैं। ये फसलें किसानों की आय का महत्वपूर्ण स्रोत हैं, लेकिन इसी के साथ इन पर एक घातक खतरा भी मंडरा रहा है – पीला मोजैक रोग। यह रोग तीनों फसलों को एक साथ भारी नुकसान पहुंचाने की क्षमता रखता है। कृषि विज्ञान केंद्र, रायसेन (मध्य प्रदेश) के कृषि विशेषज्ञ के अनुसार यह रोग एक वायरस के कारण होता है, जिसे सफेद मक्खी नामक कीट फैलाती है। यह कीट संक्रमित पौधों का रस चूसकर वायरस को अपने शरीर में ले जाती है और जब वह किसी स्वस्थ पौधे पर बैठती है तो वायरस उस पौधे में प्रवेश कर जाता है।
कृषि विशेषज्ञ बताते हैं कि अगर बारिश और उमस का माहौल लगातार बना रहे तो सफेद मक्खी का प्रकोप तेजी से फैलता है और कुछ ही दिनों में पूरे खेत को अपनी चपेट में ले लेता है। इस रोग के लक्षण शुरुआत में पत्तियों के पीले पड़ने से दिखाई देने लगते हैं। धीरे-धीरे पत्तियां सिकुड़ने लगती हैं, उन पर पीले धब्बे बनते हैं जो बाद में पूरी पत्ती पर फैल जाते हैं। रोगग्रस्त पौधों का विकास रुक जाता है और वे मुरझा जाते हैं। फलियों का निर्माण रुक जाता है या फिर जो फलियां बनती हैं, उनमें बीज सिकुड़े और हल्के वजन के होते हैं।
यह बीमारी सोयाबीन की उपज को 50 से 90 प्रतिशत तक और मूंग व उड़द की फसल को 10 से 100 प्रतिशत तक प्रभावित कर सकती है। यानी समय रहते उपाय न किए गए तो फसल पूरी तरह बर्बाद हो सकती है। बचाव के लिए कृषि विशेषज्ञ ने किसानों को सलाह दी है कि वे रोग प्रतिरोधी किस्मों का चयन करें और बुवाई से पहले बीजों का उपचार अवश्य करें। बीजों को थियामेथोक्सम 30 एफएस या इमिडाक्लोप्रिड 48 एसएल से उपचारित करने से 35 दिनों तक फसल पर रोग का असर नहीं होता।
साथ ही, खेतों की निगरानी भी जरूरी है। आस-पास मिर्च, टमाटर, बैंगन जैसे परपोषी पौधों की खेती से परहेज करें और खेत की मेड़ों पर खरपतवार न पनपने दें। यदि किसी पौधे में रोग के लक्षण नजर आएं तो उसे तुरंत उखाड़कर नष्ट कर देना चाहिए। खेतों में पीले चिपकने वाले ट्रैप लगाना और नीम तेल का छिड़काव करना भी सफेद मक्खी नियंत्रण के लिए उपयोगी है। अगर संक्रमण गंभीर हो तो थियामेथोक्सम 25 डब्ल्यूजी या बीटासायफ्लुथ्रिन और इमिडाक्लोप्रिड के मिश्रण का छिड़काव करें। यह मिश्रण सफेद मक्खी और वायरस दोनों पर प्रभावी नियंत्रण करता है। कृषि विशेषज्ञ ने किसानों को आगाह किया है कि इस रोग से लापरवाही बरतने पर पूरी फसल का नुकसान हो सकता है। इसलिए समय रहते उचित सावधानी और वैज्ञानिक उपाय अपनाकर किसान अपनी फसल को सुरक्षित रख सकते हैं और खरीफ सीजन में बेहतर उत्पादन सुनिश्चित कर सकते हैं।

