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सोयाबीन की खेती को लेकर कृषि विशेषज्ञों की अहम सलाह

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लखनऊ:जैसे ही मॉनसून ने उत्तर भारत में दस्तक दी, वैसे ही खेतों में हल चलने लगा है। किसान खरीफ सीजन की प्रमुख फसलों की बुवाई में जुट गए हैं। इन फसलों में सोयाबीन एक प्रमुख और लाभकारी फसल मानी जाती है। इस फसल की सफलता में उसकी सही किस्म का चयन और वैज्ञानिक तरीके से खेती बेहद जरूरी होती है। इस समय किसान भ्रम की स्थिति में हैं क्योंकि बाजार में सोयाबीन की अनेक किस्में उपलब्ध हैं, जिससे सही वैरायटी चुनना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि सोयाबीन की किस्म का चयन करते समय क्षेत्र की जलवायु, भूमि की प्रकृति और फसल चक्र को ध्यान में रखना चाहिए।

उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में खेती के लिए जिन सोयाबीन की किस्मों को उपयुक्त माना गया है उनमें पूसा सोयाबीन 14, पूसा सोयाबीन 12, पूसा 9712, पूसा 9814, पूसा 16, पीके 416, पीएस 564 और पीएस 1024 प्रमुख हैं। वहीं, यदि कोई किसान मध्य भारत के क्षेत्रों में खेती कर रहा है तो उसके लिए एनआरसी 7, एआरसी 37, जेएस 335, जेएस 93-05, जेएस 95-60, जेएस 20-34, जेएस 80-21 और एमएयूएस 81 जैसी किस्में अधिक उपयुक्त साबित होती हैं।

सोयाबीन की बुवाई खरीफ मौसम में की जाती है और इसके लिए उत्तरी मैदानी क्षेत्रों में मध्य जून से मध्य जुलाई तक का समय सबसे अच्छा होता है। इसकी सफल खेती के लिए दोमट मिट्टी जिसमें जल निकासी की सुविधा हो, सर्वोत्तम मानी जाती है। खेत की तैयारी करते समय पहले दो बार हैरो या मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई करनी चाहिए। इसके बाद देसी हल से हल्की जुताई कर खेत को समतल करना चाहिए। मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने के लिए खेत में भरपूर मात्रा में जैविक खाद मिलाना भी जरूरी होता है।

बीज की मात्रा का निर्धारण भी दानों के आकार के अनुसार किया जाना चाहिए। मोटे दानों के लिए प्रति हेक्टेयर 80 से 85 किलो, मध्यम दानों के लिए 70 से 75 किलो और छोटे दानों के लिए 60 से 65 किलो बीज पर्याप्त होते हैं। बुवाई के समय पंक्ति से पंक्ति की दूरी 45 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 5 सेंटीमीटर रखनी चाहिए। बीजों को बुवाई से पहले फफूंदनाशकों से उपचारित करना जरूरी है, ताकि फसल की शुरुआती अवस्था में रोगों से बचाव हो सके। इसके लिए प्रति किलो बीज पर 2 ग्राम थीरम और 1 ग्राम कार्बेन्डाजिम का प्रयोग करने की सलाह दी जाती है।

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान वैज्ञानिक विधियों और स्थानीय परिस्थिति के अनुसार उपयुक्त किस्मों का चयन करें तो वे कम लागत में अधिक उपज प्राप्त कर सकते हैं। इस बार मॉनसून समय पर आया है और बारिश की स्थिति भी अनुकूल दिख रही है, ऐसे में यदि किसान तैयारी के साथ बुवाई करें तो सोयाबीन की फसल से उन्हें अच्छे लाभ की उम्मीद की जा सकती है।

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