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अमरूद के बागों पर उकठा रोग का कहर, अगस्त से अक्टूबर तक सबसे बड़ा खतरा

नई दिल्ली: भारत में अमरूद एक प्रमुख फल फसल है, जो लगभग सभी राज्यों में उगाई जाती है। इसकी लोकप्रियता केवल इसके स्वाद और पोषण गुणों के कारण नहीं है, बल्कि इसकी सुलभता और खेती की सरलता भी इसे खास बनाती है। हालांकि, हाल के वर्षों में अमरूद के बागानों में एक गंभीर रोग, जिसे ‘उकठा रोग’ कहा जाता है, ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। यह रोग मिट्टी जनित होता है और जब यह सूत्रकृमियों (निमेटोड्स) के साथ मिलकर फसल को संक्रमित करता है, तो इसकी विनाशकारी क्षमता और बढ़ जाती है।

यह रोग मुख्यतः अगस्त से अक्टूबर के बीच अधिक फैलता है। शुरुआत में पत्तियों के पीले पड़ने और मुरझाने जैसे लक्षण दिखते हैं, लेकिन धीरे-धीरे यह पौधे की शाखाओं को सूखा देता है। गंभीर मामलों में, कुछ ही हफ्तों में पूरा पौधा मर सकता है। कई बार इस प्रक्रिया में महीनों भी लग सकते हैं, लेकिन अंत एक ही होता है – पेड़ की मौत और बाग का उजड़ना। रोग का असर पुराने पेड़ों पर अधिक देखा गया है, और यह उत्पादन में भारी गिरावट लाता है। कुछ अध्ययनों के अनुसार, यह रोग फसल की उपज में 30 फीसदी तक की कमी ला सकता है, और अगर समय रहते नियंत्रित न किया जाए, तो यह नुकसान 100 फीसदी तक भी पहुंच सकता है।

अमरूद के पेड़ों में इस रोग के लक्षण कई स्तरों पर दिखाई देते हैं। सबसे पहले पत्तियां पीली और मुरझाई हुई दिखती हैं, विशेषकर निचली शाखाओं की। बाद में वे लाल पड़ जाती हैं और झड़ने लगती हैं। तने पर भूरापन या रंग बदलने के संकेत मिलते हैं, और शाखाएं सिरों से सूखने लगती हैं। पौधे की महीन जड़ों पर काली धारियां दिखाई देती हैं, और अंदर की छाल आसानी से अलग होने लगती है। संक्रमित जड़ें सड़ने लगती हैं और फल छोटे, कठोर तथा अंदर से खराब हो सकते हैं। धीरे-धीरे यह रोग पूरे पौधे को अपनी चपेट में ले लेता है।

इस भयावह स्थिति से बचाव के लिए रोग की समय पर पहचान और एकीकृत प्रबंधन आवश्यक है। जैविक उपायों के तहत ट्राइकोडर्मा हार्ज़ियानम और ट्राइकोडर्मा विरिडे जैसे जैविक कवकनाशी का प्रयोग लाभकारी होता है। इन्हें पौधे की जड़ों के पास मिट्टी में मिलाकर सिंचाई करनी चाहिए। वेसिकुलर अर्बस्कुलर माइकोराइजा (VAM) और स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस जैसे जैविक एजेंट भी पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं। मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने के लिए जिप्सम, गोबर की खाद और संतुलित उर्वरकों का इस्तेमाल करना चाहिए, जिससे मिट्टी में मौजूद रोगजनकों की सक्रियता कम होती है।

रासायनिक नियंत्रण के अंतर्गत कर्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत WP जैसे फफूंदनाशकों का प्रयोग किया जा सकता है। इसे 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर पौधों की जड़ों के पास 20-30 लीटर की मात्रा में डालना चाहिए। यह प्रक्रिया 20 दिनों के अंतराल पर दोहराई जाती है। साथ ही, जिंक सल्फेट और डाय-अमोनियम फॉस्फेट (DAP) के मिश्रण का पत्तियों पर छिड़काव पौधों को पोषण देता है और रोगों के खिलाफ मजबूत बनाता है।

कुल मिलाकर, अमरूद की खेती करने वाले किसानों के लिए यह समय सतर्कता और सजगता का है। अगस्त से अक्टूबर के दौरान बागों की नियमित निगरानी, लक्षणों की त्वरित पहचान और समय पर जैविक या रासायनिक उपायों को अपनाकर इस विनाशकारी रोग से बचा जा सकता है। अमरूद जैसे लाभकारी फलों की सुरक्षा न केवल किसानों की आजीविका के लिए जरूरी है, बल्कि खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

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