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गेहूं के दाम एमएसपी से नीचे, किसानों की बढ़ी चिंता

wheat prices

नई दिल्ली: भारतीय कृषि बाजार में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है, जहां पिछले 52 महीनों से लगातार बढ़ते रहे गेहूं के दाम अब न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे पहुंच गए हैं। यह स्थिति ऐसे समय में बनी है जब देश और दुनिया में गेहूं के रिकॉर्ड उत्पादन का अनुमान लगाया जा रहा है, जिससे बाजार में अधिक आपूर्ति के कारण कीमतों पर दबाव बढ़ गया है।

रिकॉर्ड उत्पादन बना कीमत गिरने की वजह

भारत में गेहूं उत्पादन 113.29 मिलियन टन से बढ़कर लगभग 117.95 मिलियन टन तक पहुंचने का अनुमान है। वहीं वैश्विक स्तर पर उत्पादन 842 मिलियन टन तक पहुंच सकता है। उत्पादन में इस तेजी से बढ़ोतरी के कारण बाजार में गेहूं की अधिक उपलब्धता हो गई है, जिससे कीमतों में गिरावट आई है।

एमएसपी से नीचे पहुंचे बाजार भाव

हाल के आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 2585 रुपये प्रति क्विंटल है, जबकि खुले बाजार में इसका भाव लगभग 2441.88 रुपये प्रति क्विंटल चल रहा है। मार्च 2026 में भी यही स्थिति देखने को मिली थी, जब एमएसपी 2425 रुपये होने के बावजूद बाजार भाव इससे नीचे रहा।

बढ़ते स्टॉक से दबाव में बाजार

भारतीय खाद्य निगम के पास गेहूं का स्टॉक जरूरत से काफी अधिक है। अप्रैल 2026 तक अनुमानित स्टॉक 182 लाख टन है, जो निर्धारित मानकों से कई गुना ज्यादा है। इसके अलावा निजी व्यापारियों और कंपनियों के पास भी बड़ी मात्रा में गेहूं मौजूद है, जिससे नई फसल की मांग कमजोर हो गई है।

सरकारी नीति भी बनी कारण

सरकार द्वारा खुले बाजार में स्टॉक जारी करने की नीति के चलते भी कीमतों पर असर पड़ा है। अधिक आपूर्ति के कारण थोक और खुदरा दोनों स्तरों पर दाम में नरमी आई है। हालांकि इसका उद्देश्य आम लोगों को महंगाई से राहत देना है, लेकिन इसका सीधा असर किसानों की आय पर पड़ रहा है।

मांग से तेज बढ़ रहा उत्पादन

देश में गेहूं की मांग हर साल बढ़ रही है, लेकिन उत्पादन की गति उससे अधिक तेज है। 2026-27 तक देश को लगभग 104 मिलियन टन गेहूं की जरूरत होगी, जबकि उत्पादन इससे कहीं अधिक रहने का अनुमान है। इस अतिरिक्त उत्पादन ने बाजार में असंतुलन पैदा कर दिया है।

किसानों के सामने नई चुनौती

इस स्थिति ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि उन्हें अपनी मेहनत का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है। अधिक उत्पादन जहां एक ओर खाद्य सुरक्षा के लिए अच्छा संकेत है, वहीं दूसरी ओर किसानों के लिए आर्थिक संकट का कारण बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि बेहतर भंडारण, निर्यात को बढ़ावा और संतुलित नीति के जरिए इस स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता है, ताकि किसानों को उनकी उपज का सही मूल्य मिल सके और बाजार में संतुलन बना रहे।

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