नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में जारी तनाव को देखते हुए भारत सरकार ने देश में उर्वरकों और उनके कच्चे माल की आपूर्ति सुरक्षित रखने के लिए पहले से रणनीति बनानी शुरू कर दी है। कृषि आयुक्त पी.के. सिंह ने बताया कि यदि क्षेत्रीय संघर्ष लंबे समय तक जारी रहता है तो आयात प्रभावित होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में सरकार वैकल्पिक देशों से उर्वरक और आवश्यक कच्चे माल की आपूर्ति सुनिश्चित करने के विकल्प तलाश रही है। फिलहाल देश में उर्वरकों की उपलब्धता सामान्य बनी हुई है और किसी तरह की कमी की स्थिति नहीं है।
उर्वरक और कच्चे माल के लिए नए विकल्प तलाशे जा रहे
कृषि आयुक्त ने बताया कि सरकार रॉक फॉस्फेट और सल्फर जैसे महत्वपूर्ण कच्चे माल के साथ-साथ उर्वरकों की आपूर्ति के लिए अन्य देशों के विकल्प खोज रही है। यह कदम एहतियात के तौर पर उठाया जा रहा है, ताकि यदि पश्चिम एशिया में संघर्ष लंबा चलता है तो देश के कृषि क्षेत्र पर इसका नकारात्मक प्रभाव न पड़े। उन्होंने स्पष्ट किया कि वर्तमान समय में उर्वरकों की उपलब्धता में कोई बाधा नहीं आई है और आपूर्ति व्यवस्था सामान्य रूप से चल रही है।
पश्चिम एशिया पर काफी निर्भर है भारत
भारत उर्वरकों के आयात के मामले में पश्चिम एशिया और मध्य पूर्व के देशों पर काफी हद तक निर्भर है। देश में उपयोग होने वाले यूरिया और फॉस्फेट आधारित उर्वरकों का 40 प्रतिशत से अधिक हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है। इसके अलावा रॉक फॉस्फेट और फॉस्फोरिक अम्ल की बड़ी मात्रा भी इसी क्षेत्र से आयात की जाती है। ऐसे में यदि क्षेत्रीय संकट लंबा खिंचता है तो आपूर्ति शृंखला प्रभावित होने की आशंका बनी रह सकती है।
गैस आपूर्ति को लेकर फिलहाल स्थिति सामान्य
उर्वरक उत्पादन के लिए आवश्यक तरलीकृत प्राकृतिक गैस की उपलब्धता को लेकर भी सवाल उठे हैं। इस पर कृषि आयुक्त ने कहा कि फिलहाल गैस आयात को लेकर कोई तत्काल चिंता की स्थिति नहीं है। हालांकि यदि संघर्ष लंबे समय तक चलता है तो आगे की परिस्थितियों के अनुसार वैकल्पिक व्यवस्था की जाएगी। सरकार इस दिशा में पहले से तैयारी कर रही है।
घरेलू उत्पादन भी बना सहारा
सरकार के अनुसार देश में उर्वरकों का घरेलू उत्पादन भी पर्याप्त स्तर पर हो रहा है, जिससे आपूर्ति संतुलित बनाए रखने में मदद मिल रही है। विशेष रूप से यूरिया का उत्पादन भारत में बड़ी मात्रा में किया जाता है। इसलिए यदि आयात में कुछ व्यवधान आता भी है तो घरेलू उत्पादन के सहारे स्थिति को संभाला जा सकता है।
किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग की सलाह
कृषि आयुक्त ने किसानों से उर्वरकों का संतुलित और वैज्ञानिक उपयोग करने की अपील भी की। उन्होंने कहा कि यदि किसान फसलों के लिए निर्धारित पोषक तत्वों की अनुशंसित मात्रा का पालन करें तो उत्पादन पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा। असंतुलित उर्वरक उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होती है, इसलिए संतुलित पोषण व्यवस्था अपनाना जरूरी है।
मिट्टी की घटती उर्वरता बनी चुनौती
विशेषज्ञों ने देश में मिट्टी की घटती उर्वरता को भी चिंता का विषय बताया है। कृषि आयुक्त के अनुसार मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा कम होने से पोषक तत्वों की उपलब्धता प्रभावित हो रही है। अलग-अलग फसलों की पोषक आवश्यकताएं अलग होती हैं, लेकिन कई बार किसानों को जरूरी उर्वरक पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल पाते, जिससे असंतुलित उपयोग की समस्या पैदा हो जाती है।
सिंचाई प्रबंधन और प्राकृतिक खेती पर जोर
सरकार सिंचाई प्रबंधन, जलग्रहण क्षेत्र विकास और मिट्टी संरक्षण से जुड़े कार्यक्रमों को बेहतर तरीके से जोड़ने पर काम कर रही है। साथ ही प्राकृतिक खेती मिशन को भी बढ़ावा दिया जा रहा है, ताकि कृषि उत्पादन को अधिक टिकाऊ बनाया जा सके। कृषि आयुक्त ने कहा कि महामारी के समय भी आपूर्ति बाधित होने के बावजूद कृषि उत्पादन पर बड़ा असर नहीं पड़ा था। इसी तरह यदि वर्तमान स्थिति लंबी चलती है तो भी सरकार वैकल्पिक व्यवस्थाओं के माध्यम से कृषि क्षेत्र को प्रभावित होने से बचाने के प्रयास करेगी।
कृषि निर्यात पर फिलहाल असर नहीं
पश्चिम एशिया के साथ कृषि व्यापार को लेकर भी फिलहाल स्थिति सामान्य बताई गई है। कृषि आयुक्त ने कहा कि भारत से इस क्षेत्र में विशेष रूप से बासमती चावल का निर्यात पहले ही बड़ी मात्रा में हो चुका है और मांग में कमी के संकेत नहीं हैं। यदि कहीं देरी होती भी है तो वह केवल आपूर्ति शृंखला के स्तर पर समय से जुड़ा मामला हो सकता है।
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