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इस साल बेहतर मॉनसून से दलहन की खेती में उम्मीदें बढ़ीं

Hopes for pulse cultivation have risen this year due to a better monsoon

नई दिल्ली: देश में इस वर्ष मॉनसून सामान्य और अनुकूल रहने की संभावना जताई गई है, जिसका सीधा असर खरीफ फसलों की बुआई पर देखने को मिल रहा है। खासतौर से दलहनी फसलों की खेती में किसानों की रुचि बढ़ी है। कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 20 जून तक देश के कुछ राज्यों में दलहनी फसलों का रकबा पिछले वर्ष की तुलना में अधिक रहा, जिससे यह संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले समय में दालों का उत्पादन बेहतर हो सकता है। लेकिन दलहन फसलों की खेती के साथ एक बड़ी समस्या भी जुड़ी हुई है – खरपतवारों का प्रकोप। दलहनी फसलें खरपतवारों के प्रति अत्यंत संवेदनशील होती हैं और अगर समय रहते इन पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है। ऐसे में कृषि वैज्ञानिक और विशेषज्ञ अब किसानों को खरपतवार नियंत्रण की प्रभावी और व्यावहारिक विधियों की जानकारी देने में जुटे हैं।

खरपतवार नियंत्रण की यांत्रिक विधियां

आईसीएआर से जुड़े वैज्ञानिकों के अनुसार, दलहनी फसलों में खरपतवार नियंत्रण के लिए यांत्रिक विधियां सबसे आसान और प्रभावशाली मानी जाती हैं। इसमें हाथ से खरपतवार निकालना, हाथ से चलने वाले औजारों और मशीनों का उपयोग और खेत की सिंचाई के जरिए खरपतवारों को नियंत्रित करना शामिल है। आधुनिक कृषि उपकरण जैसे कोनोवीडर, व्हील-हो और मोटर चालित वीडर से खरपतवार नियंत्रण अब पहले की तुलना में आसान और तेज हो गया है।

भूपरिष्करण या मिट्टी पलट जुताई

खरपतवार नियंत्रण के लिए गर्मी के मौसम में गहरी जुताई बेहद प्रभावी मानी जाती है। इस विधि से खरपतवार के बीज मिट्टी की गहराई में चले जाते हैं या ऊपरी सतह पर आकर तेज गर्मी में नष्ट हो जाते हैं। लगातार कुछ वर्षों तक इस तकनीक को अपनाने से खेतों में खरपतवार की समस्या में स्थायी कमी लाई जा सकती है।

हाथ से खरपतवार उखाड़ने की पारंपरिक विधि

फसल की बुआई के 20-25 दिनों बाद, जब खरपतवार हाथ से पकड़ने योग्य हो जाए, तो उन्हें हाथ से उखाड़ना भी एक असरदार तरीका है। इस विधि से निकाले गए खरपतवारों को फसल क्षेत्र से दूर गहराई में दबा देना चाहिए या उन्हें खेत में ही आच्छादन के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। हालांकि यह तरीका मुख्य रूप से छोटे क्षेत्रों और सिंचित खेतों के लिए अधिक उपयुक्त है।

निराई–गुड़ाई से जैविक नियंत्रण

जैविक खेती को बढ़ावा देने वाले किसानों के लिए निराई-गुड़ाई एक बेहतरीन विकल्प है। इसके लिए खुरपी, कोनोवीडर, पैडी वीडर जैसे औजारों का उपयोग किया जाता है। यह विधि तभी प्रभावी होती है जब फसलों की बुआई पंक्तियों में की गई हो। सिंचित क्षेत्रों में फसल के 20-25 दिनों बाद पहली निराई और जरूरत पड़ने पर 10-15 दिन बाद दूसरी निराई जरूरी मानी जाती है, क्योंकि इस दौरान खरपतवारों की वृद्धि तेज होती है।

गहरी जड़ वाले खरपतवारों का समाधान

ऐसे खरपतवार जिनकी जड़ें गहरी होती हैं, उनके ऊपरी भाग को बार-बार काटने से उनकी वृद्धि रुक जाती है और वे धीरे-धीरे समाप्त हो जाते हैं। इसी प्रकार एकवर्षीय खरपतवारों को समय रहते, विशेष रूप से फूल और बीज बनने से पहले उखाड़ देना चाहिए ताकि उनका विस्तार रोका जा सके। इस वर्ष मॉनसून की अच्छी स्थिति के कारण जहां किसान दलहन फसलों की ओर आकर्षित हो रहे हैं, वहीं खरपतवार नियंत्रण की ये तकनीकें उन्हें अधिक उत्पादन और बेहतर लाभ देने में मदद कर सकती हैं। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि किसान समय पर सही विधियों को अपनाएं तो खरपतवार जैसी चुनौतियों को नियंत्रित करते हुए दालों के उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है। भारत जैसे देश में जहां दलहन फसलें खाद्य सुरक्षा के लिहाज से अहम भूमिका निभाती हैं, वहां बेहतर मॉनसून और आधुनिक कृषि प्रबंधन के साथ खरपतवार नियंत्रण की समुचित रणनीति किसानों की आय को बढ़ाने में निर्णायक भूमिका निभा सकती है।

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