लखनऊ: भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था आज भी मुख्य रूप से कृषि और पशुपालन पर आधारित है। गांवों में रहने वाले अधिकांश परिवार खेती के साथ-साथ पशुपालन कर अपनी आजीविका चलाते हैं। विशेषकर महिलाएं, बुजुर्ग और छोटे किसान पशुपालन के जरिए अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत करते हैं। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि वे सही नस्ल के पशुओं का पालन करें ताकि कम संसाधनों में अधिक लाभ कमाया जा सके। खासकर गाय पालन में देशी नस्लों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है, जो कम लागत में ज्यादा दूध देने की क्षमता रखती हैं। भारत को ‘दुग्ध उत्पादन की राजधानी’ कहा जाता है और इसके पीछे बड़ी वजह है देश में पाई जाने वाली उत्कृष्ट गाय नस्लें। भारत में दुनिया की सबसे अधिक गायें पाई जाती हैं और वैश्विक दूध उत्पादन में देश का योगदान 24% से भी अधिक है। इसके बाद अमेरिका, चीन और ब्राज़ील जैसे देश आते हैं। गाय का दूध अपने पोषक गुणों के कारण महंगे दामों पर बिकता है और इसमें पाए जाने वाले ए2 प्रोटीन जैसे तत्व इसे स्वास्थ्य के लिए और अधिक लाभकारी बनाते हैं। यही कारण है कि पशुपालकों की पहली पसंद अधिक दूध देने वाली देशी नस्ल की गायें होती हैं।
राठी गाय: राजस्थान की कामधेनु
राठी गाय को देशी नस्लों में सबसे बेहतर माना जाता है। यह खासकर राजस्थान के बीकानेर, गंगानगर और हनुमानगढ़ क्षेत्रों में पाई जाती है। राठी गाय की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह गर्म और कठोर जलवायु में भी आसानी से ढल जाती है। औसतन यह रोजाना 7 से 12 लीटर दूध देती है, लेकिन यदि इसे अच्छा पोषण और देखभाल मिले तो यह 18 लीटर तक दूध दे सकती है। इसकी सहनशक्ति और लंबी उम्र इसे ग्रामीण क्षेत्रों के लिए आदर्श बना देती है।
साहिवाल गाय: उत्तर भारत की भरोसेमंद नस्ल
साहिवाल गाय पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में बड़े पैमाने पर पाली जाती है। यह नस्ल गर्म जलवायु के प्रति सहनशील होती है और बीमारियों से लड़ने की बेहतर क्षमता रखती है। दूध उत्पादन की बात करें तो यह औसतन 10 से 20 लीटर दूध देती है। कुछ मामलों में सही देखभाल और संतुलित आहार के साथ यह 25 लीटर तक भी दूध देने की क्षमता रखती है। साहिवाल गाय का दूध घी और दही बनाने के लिए अत्यंत उपयुक्त माना जाता है।
गिर गाय: ए2 दूध की अद्भुत स्रोत
गिर गाय गुजरात और महाराष्ट्र के कुछ क्षेत्रों में पाई जाती है। यह नस्ल न केवल दूध उत्पादन में आगे है, बल्कि इसका दूध स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत लाभदायक होता है क्योंकि इसमें ए2 प्रोटीन पाया जाता है। गिर गाय प्रतिदिन औसतन 12 से 20 लीटर दूध देती है। इसका शरीर मजबूत होता है और यह लंबे समय तक दुग्ध उत्पादन करने में सक्षम रहती है। गिर नस्ल की गायें अब देश के अन्य भागों में भी लोकप्रिय हो रही हैं।
थारपारकर गाय: रेगिस्तान की संजीवनी
राजस्थान के थार मरुस्थल से संबंधित थारपारकर गाय अपनी सहनशीलता के लिए जानी जाती है। यह नस्ल कम पानी में जीवित रह सकती है और अत्यधिक गर्मी में भी दुग्ध उत्पादन को बनाए रखती है। थारपारकर गाय का दूध गुणवत्ता में श्रेष्ठ होता है और इसका उपयोग विशेष रूप से घी और औषधीय उत्पादों के निर्माण में किया जाता है। यह नस्ल उन क्षेत्रों में विशेष उपयोगी होती है जहां प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं।
देशी नस्लों से बढ़ रही ग्रामीण आमदनी
भारत में दूध उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए सरकार भी लगातार प्रयास कर रही है। विभिन्न राज्य सरकारें और पशुपालन विभाग समय-समय पर गायों की नस्ल सुधार, टीकाकरण और डेयरी प्रबंधन के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम चला रहे हैं। साथ ही सब्सिडी आधारित पशु खरीद योजनाएं भी चलाई जा रही हैं ताकि ग्रामीण परिवार कम पूंजी में भी लाभकारी पशुपालन कर सकें।
ऐसे में अगर ग्रामीण क्षेत्रों में सही जानकारी और संसाधन उपलब्ध कराए जाएं, तो देशी नस्लों की इन गायों के माध्यम से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी जा सकती है। पशुपालक न केवल अपनी आय बढ़ा सकते हैं बल्कि पोषण सुरक्षा और स्थानीय बाजार की मांग भी पूरी कर सकते हैं। यही वजह है कि अब देशी नस्लों की गायें एक बार फिर से ग्रामीण विकास की रीढ़ बनने लगी हैं।

