नई दिल्ली: अरहर यानी तूर की खेती देश के लाखों किसानों के लिए आमदनी का महत्वपूर्ण स्रोत है। दालों की बढ़ती मांग और बाजार में अच्छे भाव की संभावना को देखते हुए किसान इसकी खेती में रुचि लेते हैं। हालांकि, अरहर की अच्छी पैदावार के लिए उन्नत किस्म का चयन बेहद जरूरी है। किसानों को ऐसी किस्मों का चुनाव करना चाहिए, जो उनके क्षेत्र की जलवायु और मिट्टी के अनुकूल हों, कम समय में पकती हों और उकठा तथा बांझपन मोजेक जैसे प्रमुख रोगों के प्रति सहनशील या प्रतिरोधी हों। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और विभिन्न कृषि संस्थानों ने अलग-अलग कृषि क्षेत्रों के लिए अरहर की कई किस्में विकसित की हैं। इनमें अगेती, मध्यम अवधि और देर से पकने वाली किस्मों के साथ कुछ संकर किस्में भी शामिल हैं। किस्म का चयन करते समय पकने की अवधि, संभावित उपज, सिंचाई की उपलब्धता और स्थानीय रोगों की स्थिति को ध्यान में रखना चाहिए।
अरहर की प्रमुख उन्नत किस्में और उनकी विशेषताएं
अरहर की किस्मों को उनकी पकने की अवधि और खेती के क्षेत्र के आधार पर चुना जा सकता है। उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में अगेती किस्में उन किसानों के लिए उपयोगी हो सकती हैं, जो फसल की कटाई के बाद गेहूं जैसी अगली फसल की बुवाई करना चाहते हैं। वहीं, मध्य और देर से पकने वाली किस्मों का चयन स्थानीय मौसम और खेती की व्यवस्था के अनुसार किया जाता है।
अगेती किस्में
- पूसा अरहर 151: उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र के लिए अनुशंसित किस्मों में शामिल है।
- पूसा 855: जल्दी पकने वाली किस्मों में शामिल है।
- पूसा 33: अगेती किस्म है।
- यूपीएएस-120: लगभग 130-140 दिनों में पकने वाली किस्म है। उत्तर प्रदेश के मैदानी क्षेत्रों के साथ राजस्थान और हरियाणा में भी इसकी खेती की जाती है।
- पंत अरहर-291: जल्दी पकने वाली किस्मों में शामिल है।
- जागृति (आईसीपीएल-151): अगेती किस्म के रूप में जानी जाती है।
मध्यम अवधि और देर से पकने वाली किस्में
- टाइप-21: मध्यम अवधि में पकने वाली पारंपरिक किस्मों में शामिल है।
- जवाहर अरहर-4: मध्यम अवधि की किस्म है।
- आईसीपीएल-87119 (आशा): मध्यम अवधि में पकने वाली लोकप्रिय किस्मों में शामिल है।
- बहार: देर से पकने वाली किस्म है।
- पूसा-9: लंबी अवधि की किस्मों में शामिल है।
- शरद: देर से पकने वाली किस्म है।
रोग प्रतिरोधक क्षमता वाली अरहर की किस्में
अरहर की फसल में उकठा रोग और बांझपन मोजेक रोग किसानों के लिए बड़ी समस्या बन सकते हैं। इनसे बचाव के लिए रोग प्रतिरोधी या सहनशील किस्मों का चयन करना जरूरी है। भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान की ओर से जारी किस्मों में कुछ महत्वपूर्ण विकल्प शामिल हैं।
| किस्म | प्रमुख विशेषता | उपयुक्त क्षेत्र |
|---|---|---|
| आईपीए 15-2 (शारदा) | उकठा और बांझपन मोजेक के प्रति प्रतिरोधी | उत्तर-पूर्वी मैदानी क्षेत्र |
| आईपीए 203 (प्रकाश) | उकठा रोग के प्रति प्रतिरोधी | उत्तर-पूर्वी मैदानी क्षेत्र |
| आईपीए 206 (गंगा) | उकठा और बांझपन मोजेक के प्रति प्रतिरोधी | उत्तर प्रदेश |
| आईपीए 15-6 | उकठा और बांझपन मोजेक के प्रति प्रतिरोधी | मध्य क्षेत्र |
संस्थान के अनुसार, आईपीए 15-2 की संभावित उपज 28-33 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और आईपीए 203 की 25-28 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक बताई गई है। आईपीए 206 की संभावित उपज 25-26 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। वहीं, आईपीए 15-6 मध्य क्षेत्र के लिए अनुशंसित है, जिसमें मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ शामिल हैं। इसकी अलग-अलग स्थानों पर औसत उपज लगभग 19 क्विंटल प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई है।
अरहर की संकर किस्में भी दे सकती हैं बेहतर उत्पादन
अरहर की कुछ संकर किस्में भी विकसित की गई हैं, जिनमें आईपीएच 15-03 और आईपीएच 9-05 प्रमुख हैं। भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान के अनुसार, इनकी संभावित उपज क्रमशः 24-25 और 22-23 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। दोनों की पकने की अवधि लगभग 150-155 दिन बताई गई है। आईपीएच 9-05 में फाइटोफ्थोरा झुलसा और बांझपन मोजेक के प्रति सहनशीलता के गुण भी बताए गए हैं।
अरहर की किस्म चुनते समय इन बातों का रखें ध्यान
किसानों को केवल अधिक उपज देने वाली किस्म देखकर बीज नहीं खरीदना चाहिए। अपने जिले और कृषि जलवायु क्षेत्र के लिए अनुशंसित किस्म का चयन करना अधिक जरूरी है। इसके लिए कुछ बातों का ध्यान रखें:
- पकने की अवधि: यदि अरहर के बाद गेहूं या दूसरी रबी फसल बोनी है, तो अगेती किस्मों को प्राथमिकता दें।
- रोगों का प्रकोप: जिन क्षेत्रों में उकठा या बांझपन मोजेक रोग की समस्या अधिक है, वहां इनके प्रति प्रतिरोधी किस्म चुनें।
- सिंचाई की उपलब्धता: वर्षा आधारित और सिंचित खेती के लिए स्थानीय रूप से अनुशंसित किस्मों का चयन करें।
- बीज की गुणवत्ता: प्रमाणित स्रोत से शुद्ध और अच्छी अंकुरण क्षमता वाला बीज खरीदें।
- स्थानीय कृषि सलाह: बुवाई से पहले कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विश्वविद्यालय से अपने क्षेत्र के लिए किस्म की उपयुक्तता की जानकारी लें।
किसानों के लिए जरूरी सलाह: अरहर की किसी भी किस्म की संभावित उपज हर खेत में समान नहीं मिलती। उत्पादन मिट्टी, मौसम, बुवाई के समय, पौधों की संख्या, पोषण प्रबंधन और फसल सुरक्षा पर निर्भर करता है। इसलिए अपने क्षेत्र के लिए जारी आधिकारिक सिफारिश को प्राथमिकता दें। कुल मिलाकर, अरहर की अच्छी पैदावार के लिए सही किस्म का चुनाव पहला महत्वपूर्ण कदम है। अगेती किस्में कम समय में फसल तैयार करने वाले किसानों के लिए उपयोगी हो सकती हैं, जबकि रोग प्रतिरोधी किस्में फसल को प्रमुख बीमारियों से होने वाले नुकसान से बचाने में मदद कर सकती हैं। किसानों को बीज खरीदने से पहले अपने क्षेत्र के लिए उसकी अनुशंसा जरूर जांचनी चाहिए।
ये भी पढ़ें: खेत में सही समय पर गोबर की खाद डालना है ज़रूरी, जानिए फायदे

