लखनऊ: खरीफ सीजन में उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर धान की खेती होती है, लेकिन इस बार लगातार हो रही बारिश और जलभराव के कारण किसानों के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। बरसात के मौसम में धान की फसल पर कई तरह के कीट और रोग हमलावर हो जाते हैं, जिनमें जड़ गलन रोग (रूट रॉट) सबसे प्रमुख है। इस समस्या से निपटने के लिए कृषि विभाग ने किसानों के लिए विशेष एडवाइजरी जारी की है और सुझाव सोशल मीडिया के माध्यम से साझा किए हैं।
एडवाइजरी के अनुसार, जड़ गलन रोग आमतौर पर धान की रोपाई के 20 से 30 दिन बाद दिखाई देता है। इसकी शुरुआती पहचान धान की पत्तियों का पीला पड़ना है, जो नाइट्रोजन और जिंक की कमी के कारण होता है। कई बार खेतों में पानी लंबे समय तक भरने से पौधों की जड़ें सड़ जाती हैं और पौधे कमजोर होकर पीले पड़ जाते हैं। इस समस्या से बचाव के लिए खेत में पानी निकास की उचित व्यवस्था होनी चाहिए ताकि जलभराव से बचा जा सके। कल्ले निकलते समय नाइट्रोजन और जिंक का समय पर छिड़काव करना आवश्यक है। रोग और कीट प्रबंधन के लिए केवल विशेषज्ञों द्वारा सुझाए गए खरपतवार नाशक और कीटनाशकों का ही प्रयोग करना चाहिए। सिंचाई पौधों की जरूरत के अनुसार की जाए और अधिक पानी देने से बचा जाए। मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने के लिए जैविक खाद का उपयोग किया जाए और आवश्यकता पड़ने पर कृषि विशेषज्ञ की सलाह ली जाए।
एडवाइजरी में चेतावनी दी गई है कि समय पर रोकथाम न होने पर धान के पौधों का विकास रुक जाता है, जिससे उत्पादन पर गंभीर असर पड़ता है। इस बीच, उत्तर प्रदेश में लगातार बारिश से नदियां उफान पर हैं। गंगा समेत कई बड़ी नदियां खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं, जिसके चलते कई गांवों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो गई है। चारों ओर पानी भर जाने से खेतों में जलभराव बढ़ा है और किसानों की मुश्किलें दोगुनी हो गई हैं। मौजूदा हालात में सतर्कता और समय पर फसल प्रबंधन ही किसानों की फसल को बचा सकता है।

