नई दिल्ली: बरसात का मौसम भले ही खेती के लिए अनुकूल माना जाता हो, लेकिन यह सब्जियों की कुछ प्रमुख फसलों जैसे मिर्च, टमाटर और बैंगन के लिए बड़ी चुनौती बनकर सामने आता है। खासकर ‘पत्ती मरोड़’ रोग इस मौसम में किसानों की चिंता का बड़ा कारण बनता जा रहा है। यह एक वायरल बीमारी है, जो समय पर नियंत्रण न मिलने पर पूरी फसल को बर्बाद कर सकती है।
पत्ती मरोड़ रोग के लक्षण साफ नजर आते हैं। संक्रमित पौधों की पत्तियां मुड़ने लगती हैं, उनका रंग पीला पड़ जाता है और अंततः पूरा पौधा सूख जाता है। यह बीमारी सीधे तौर पर फसल की उपज को प्रभावित करती है। यह वायरस सफेद मक्खी और थ्रिप्स जैसे बेहद छोटे कीटों द्वारा फैलता है, जो संक्रमित पौधों से वायरस लेकर स्वस्थ पौधों तक पहुंचाते हैं। बरसात के मौसम में वातावरण में नमी और तापमान दोनों अधिक रहते हैं, जो सफेद मक्खियों के प्रजनन के लिए अनुकूल होते हैं। यही कारण है कि इस मौसम में यह रोग तेजी से फैलता है।
इस रोग से बचाव की शुरुआत नर्सरी से ही की जा सकती है। नर्सरी को कीटों से बचाने के लिए कीट अवरोधी जाल यानी इंसेक्टप्रूफ नेट का उपयोग बेहद कारगर होता है। जैसे मच्छरदानी हमें मच्छरों से बचाती है, वैसे ही यह नेट पौधों को सफेद मक्खी के हमले से बचाता है। 40 या 50 मेष वाले जाल के इस्तेमाल से कम से कम 30 दिनों तक नर्सरी को संक्रमण से बचाया जा सकता है।
जब नर्सरी के पौधों को मुख्य खेत में रोपने का समय आए, तो उनकी जड़ों को कीटनाशक के घोल में कुछ समय तक डुबोकर रखना फायदेमंद होता है। इसके लिए इमिडाक्लोप्रिड नामक सिस्टेमिक कीटनाशक का एक मिलीलीटर मात्रा को चार लीटर पानी में मिलाकर एक घोल तैयार किया जाता है। इस घोल में पौधों की जड़ों को 20 से 25 मिनट तक डुबोने से वे अगले 15 से 20 दिनों तक कीटों के असर से सुरक्षित रहते हैं।
फसल की उम्र जैसे-जैसे बढ़ती है, उसे अतिरिक्त सुरक्षा की जरूरत होती है। एक महीने पुरानी फसल पर थियामेथोक्साम जैसे कीटनाशक का छिड़काव करना लाभदायक होता है। इसकी 40 से 50 ग्राम मात्रा प्रति एकड़ की दर से प्रयोग की जा सकती है। वहीं, इमिडाक्लोप्रिड की एक मिली मात्रा को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करना भी एक असरदार तरीका है।
कम लागत में भी किसान अपनी फसल की सुरक्षा कर सकते हैं। इसके लिए येलो स्टिकी ट्रैप का इस्तेमाल एक आसान और कारगर उपाय है। पीला रंग सफेद मक्खी को आकर्षित करता है और वह इन जालों पर चिपक जाती है। एक एकड़ खेत में आठ से बीस ट्रैप लगाने से कीटों की संख्या को नियंत्रित किया जा सकता है। बाजार में ये ट्रैप आसानी से उपलब्ध हैं, लेकिन किसान चाहें तो इन्हें खुद भी बना सकते हैं। किसी भी डिब्बे पर पीला रंग कर, उस पर ग्रीस या अरंडी का तेल लगाकर भी वैसा ही प्रभाव पाया जा सकता है।
मिर्च, टमाटर और बैंगन की फसलों के बीच मक्का लगाने की सलाह भी विशेषज्ञ देते हैं। मक्का सफेद मक्खियों को आकर्षित करता है, जिससे यह कीट मुख्य फसल से दूर रहते हैं और वायरस का संक्रमण सीमित रहता है। इस तरह की रणनीतियों को अपनाकर किसान अपनी फसलों को सुरक्षित रख सकते हैं।
पत्ती मरोड़ रोग भले ही गंभीर खतरा हो, लेकिन थोड़ी सी सतर्कता और समय पर उठाए गए वैज्ञानिक कदम फसलों को इसके प्रकोप से बचा सकते हैं। फसल की रक्षा से न केवल उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि गुणवत्ता में भी सुधार आएगा और बाजार में बेहतर कीमत मिल सकेगी। बरसात के मौसम में यह सतर्कता किसानों की मेहनत और निवेश को सुरक्षित रखने का सबसे कारगर उपाय बन सकती है।

