नई दिल्ली: बरसात का मौसम जहां किसानों के लिए फसलों के लिहाज से राहत लेकर आता है, वहीं पशुपालकों के लिए कई तरह की चुनौतियां भी पैदा करता है। इस मौसम में पशुओं में संक्रमण और बीमारियों का खतरा काफी बढ़ जाता है। बरसात के दौरान स्किन से जुड़ी समस्याएं अधिक होती हैं, जिनमें चिंचड़ और किलनी के साथ-साथ खुजली एक गंभीर समस्या है। यह छोटे-बड़े सभी तरह के पशुओं को प्रभावित करती है और दूध उत्पादन में गिरावट का कारण बनती है।
भेड़-बकरी, गाय-भैंस, घोड़ा या याक खुजली की परेशानी सभी पर असर डालती है। शरीर के कुछ हिस्सों की खुजली तो पशु खुद पूंछ या पंजे से दूर करने की कोशिश कर लेते हैं, लेकिन ऐसे कई हिस्से होते हैं जहां वे नहीं पहुंच पाते। खूंटे से बंधे पशु आसपास की किसी वस्तु से रगड़कर खुजली मिटाने की कोशिश करते हैं, जबकि खुले पशु कभी पेड़, दीवार, लोहे के तार-बाड़ या कांटेदार झाड़ियों से खुद को रगड़ते हैं। कई बार इस प्रक्रिया में वे घायल हो जाते हैं, जिससे शरीर में इंफेक्शन फैल सकता है। यह समस्या केवल शारीरिक तकलीफ तक सीमित नहीं रहती, बल्कि मानसिक रूप से भी पशु को परेशान करती है। खुजली की वजह से उनका खाना-पीना प्रभावित होता है और धीरे-धीरे दूध उत्पादन में कमी आ जाती है। गंभीर मामलों में संक्रमण इतना बढ़ सकता है कि पशु की जान तक चली जाती है।
इस समस्या के समाधान के लिए बाजार में अब पशुओं के लिए विशेष प्रकार के ब्रॉश उपलब्ध हैं, जिनसे वे खुद को रगड़कर खुजली से राहत पा सकते हैं। हालांकि, ये ब्रॉश फिलहाल आयात किए जा रहे हैं, जिसके चलते इनकी कीमतें अधिक हैं। जब इनका निर्माण देश में शुरू होगा, तो कीमत में कमी आने की संभावना है। इस समय बाजार में मैक्सी, मिडी, मिनी और टोटम नाम से चार तरह के ब्रॉश उपलब्ध हैं, जिनकी कीमत 40 हजार रुपये से लेकर एक लाख रुपये तक है। पशुपालकों के लिए यह जरूरी है कि बरसात के मौसम में पशुओं की त्वचा की नियमित देखभाल करें, समय-समय पर जांच कराएं और उन्हें ऐसे वातावरण में रखें जहां वे संक्रमण और चोट से बच सकें। इससे न केवल उनकी सेहत बेहतर रहेगी, बल्कि दूध उत्पादन भी प्रभावित नहीं होगा।

