लखनऊ: जुलाई का महीना गन्ने की फसल के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है। यही वह समय होता है जब शरदकालीन और बसंतकालीन गन्ने में कल्ले निकल चुके होते हैं और पौधों की बढ़वार तेज़ी से होती है। इस दौर में अगर थोड़ी भी लापरवाही बरती गई, खासतौर पर कीटों और बीमारियों को लेकर, तो फसल को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि फसल 15 दिन तक भी प्रभावित रहती है, तो गन्ने की बढ़वार और उपज, दोनों पर सीधा असर पड़ता है। ऐसे में जुलाई में समय पर किए गए कुछ उपाय फसल को सुरक्षित रखने के साथ-साथ उपज भी बढ़ा सकते हैं।
मॉनसून के दौरान गन्ने के खेत की मिट्टी मुलायम रहती है और इस समय तेज़ हवाओं का भी असर पौधों पर पड़ता है। ऐसे में फसल गिरने की आशंका बढ़ जाती है। वैज्ञानिकों की सलाह है कि जुलाई में मिट्टी चढ़ाने का काम कर लेना चाहिए ताकि पौधों को मजबूती मिले और वे गिरने से बचें। इसके बाद अगस्त में गन्ने की बंधाई की जाए। विशेषज्ञों का कहना है कि जुलाई से सितंबर तक के मानसूनी महीनों में गन्ना लगभग 4.9 इंच प्रति सप्ताह की दर से बढ़ता है। यदि इस समय उचित देखभाल न की जाए, तो उपज में 50 फीसदी तक की गिरावट हो सकती है।
गन्ने की बढ़ती फसल को कई रोगों से भी खतरा होता है, जिनमें पोक्का बोइंग और लाल सड़न प्रमुख हैं। जुलाई के महीने में पोक्का बोइंग रोग का प्रकोप अक्सर देखा जाता है। यह रोग फ्यूजेरियम नामक कवक के कारण होता है और रुक-रुक कर होने वाली बारिश और तेज़ धूप वाले मौसम में तेजी से फैलता है। इस बीमारी में गन्ने की पत्तियां मुरझाकर काली पड़ जाती हैं और पत्ती का ऊपरी हिस्सा सड़कर गिरने लगता है। प्रभावित पौधे की पत्तियों के नीचे का अगोला छोटा और घना हो जाता है, जिससे पौधा बौना रह जाता है और उपज में गिरावट आती है। इसकी रोकथाम के लिए कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का 0.2% घोल या बावस्टीन का 0.1% घोल बनाकर 15-15 दिन के अंतराल पर दो बार छिड़काव करने की सलाह दी जाती है।
दूसरा प्रमुख रोग है लाल सड़न, जिसमें गन्ने के अगोले की तीसरी या चौथी पत्तियां किनारों से सूखने लगती हैं और धीरे-धीरे पूरा अगोला नष्ट हो जाता है। ऐसे संक्रमित पौधों को तुरंत खेत से बाहर कर देना चाहिए ताकि अन्य पौधे संक्रमित न हों। इस रोग की रोकथाम के लिए किसानों को 2 से 3 बार थियोफिनेट मेथिल, काबेन्डाजिम या टिबूकोनाजोल का 0.1% घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। मॉनसून में गन्ने की फसल पर मिलीबग कीट का भी खतरा मंडराता है। इसकी वजह से गन्ने की बढ़वार रुक जाती है और पत्तियां काली पड़ने लगती हैं। इस समस्या से निपटने के लिए प्रभावित पत्तियों को तोड़कर नष्ट कर देना चाहिए। इसके बाद प्रति एकड़ खेत में इमिडाक्लाप्रिड 250 मिलीलीटर और ड्राईक्लोरोवास (नुवान) 100 मिलीलीटर को 250 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए।
इसके अलावा जुलाई के महीने में चोटी बेधक, जड़ बेधक और तना बेधक जैसे कीटों का हमला भी देखने को मिलता है। ये कीट गन्ने की जड़ों और तनों को नुकसान पहुंचाते हैं जिससे पौधे कमजोर हो जाते हैं और उत्पादन प्रभावित होता है। इनकी रोकथाम के लिए ट्राइकोकार्ड का इस्तेमाल कारगर उपाय है। एक ट्राइकोकार्ड में परजीवी कीट ट्राइकोग्रामा के लगभग 10,000 अंडे होते हैं जिन्हें खेत में गन्ने की निचली पत्तियों पर बांधा जाता है। ये कीट दुश्मन कीटों के अंडों को खा जाते हैं और उनकी संख्या नियंत्रित रखते हैं। कीटों के ज्यादा प्रकोप की स्थिति में हर 15 दिन के अंतराल पर ट्राइकोकार्ड का इस्तेमाल करना चाहिए। इस प्रकार, जुलाई का महीना गन्ना किसानों के लिए सतर्कता बरतने का समय है। थोड़ी सी सावधानी, समय पर उपचार और सही तकनीकों का इस्तेमाल करके किसान अपनी फसल को मानसून के कीट और रोगों से बचा सकते हैं और बेहतर उत्पादन सुनिश्चित कर सकते हैं।

