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गन्ना (नियंत्रण) आदेश, 2026: किसान हितों, राज्यों के अधिकारों और अर्थव्यवस्था पर बढ़ता संकट

sugarcane control order 2026

मेरठ: भारत में गन्ना केवल एक फसल नहीं है, बल्कि करोड़ों किसानों, खेत मजदूरों, ट्रांसपोर्टरों, छोटे व्यापारियों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा है। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा, पंजाब, बिहार, उत्तराखंड और कर्नाटक जैसे राज्यों में लाखों परिवारों की आजीविका सीधे तौर पर गन्ने पर निर्भर करती है। यही कारण है कि गन्ना क्षेत्र से जुड़े किसी भी कानून, आदेश या नीति का प्रभाव केवल चीनी उद्योग तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका असर गांवों की पूरी सामाजिक और आर्थिक संरचना पर पड़ता है। केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित गन्ना (नियंत्रण) आदेश, 2026 को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। पहली नज़र में यह आदेश चीनी उद्योग को आधुनिक बनाने और एथेनॉल आधारित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने की दिशा में एक कदम दिखाई देता है, लेकिन जब इसके प्रावधानों को गहराई से देखा जाता है तो स्पष्ट होता है कि यह आदेश किसानों के हितों, राज्यों के अधिकारों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के संतुलन पर गंभीर सवाल खड़े करता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि इस प्रस्तावित आदेश पर व्यापक राष्ट्रीय बहस हो। किसान संगठनों, कृषि विशेषज्ञों, राज्य सरकारों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े लोगों की राय लिए बिना इस प्रकार के व्यापक बदलाव लागू करना भविष्य में बड़े आर्थिक और सामाजिक संकट को जन्म दे सकता है।

एथेनॉल को मुख्य उत्पाद बनाने का प्रश्न

इस प्रस्तावित आदेश का सबसे महत्वपूर्ण और विवादास्पद पहलू यह है कि इसमें एथेनॉल को चीनी की तरह मुख्य उत्पाद की श्रेणी में रखा गया है। सरकार ने 600 लीटर एथेनॉल को 1 टन चीनी के बराबर मानने का फार्मूला प्रस्तावित किया है। प्रश्न यह है कि इस गणना का वैज्ञानिक और आर्थिक आधार क्या है? सरकार ने अब तक यह स्पष्ट नहीं किया कि यह फार्मूला किन मानकों और किस अध्ययन के आधार पर तैयार किया गया है। एथेनॉल उद्योग तेजी से लाभकारी क्षेत्र बनता जा रहा है। तेल आयात कम करने और हरित ईंधन को बढ़ावा देने के नाम पर सरकार लगातार एथेनॉल उत्पादन को प्रोत्साहित कर रही है। चीनी मिलों को इससे अतिरिक्त मुनाफा मिल रहा है, लेकिन किसानों को इस लाभ में हिस्सेदारी देने की कोई स्पष्ट व्यवस्था प्रस्तावित आदेश में नहीं दिखाई देती।

यदि गन्ना अब केवल चीनी उत्पादन के लिए नहीं बल्कि एथेनॉल उत्पादन के लिए भी इस्तेमाल हो रहा है, तो यह आवश्यक है कि किसानों को एथेनॉल से होने वाले अतिरिक्त लाभ का हिस्सा मिले। अन्यथा यह स्थिति ऐसी होगी जिसमें कच्चा माल किसान देगा, जोखिम किसान उठाएगा, लेकिन मुनाफा उद्योग और कॉरपोरेट क्षेत्र ले जाएगा।

भुगतान में देरी और ब्याज का सवाल

भारत में गन्ना किसानों की सबसे बड़ी समस्या वर्षों से बकाया भुगतान रही है। कई राज्यों में किसानों को अपनी मेहनत का पैसा महीनों तक नहीं मिल पाता। प्रस्तावित आदेश में 14 दिन के बाद भुगतान न होने पर 15 प्रतिशत ब्याज का प्रावधान रखा गया है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। जब कोई किसान बैंक से कर्ज लेता है तो उस पर भारी ब्याज लगाया जाता है। समय पर भुगतान न करने पर उसकी जमीन तक नीलाम हो सकती है। फिर यही सख्ती चीनी मिलों पर क्यों नहीं लागू होती?

ब्याज दर कम से कम 18 प्रतिशत होनी चाहिए और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि किसानों को देय ब्याज का भुगतान न करना आपराधिक कृत्य घोषित किया जाना चाहिए। जब तक मिलों के खिलाफ कठोर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक भुगतान में देरी की समस्या समाप्त नहीं होगी। और भी गंभीर बात यह है कि प्रस्तावित आदेश में गन्ना बकाया पर मिलने वाले ब्याज में से गन्ना समितियों द्वारा खर्च काटने का प्रावधान रखा गया है। यह पूरी तरह अन्यायपूर्ण है। किसान पहले ही अपने भुगतान के लिए संघर्ष करता है, ऊपर से उसके ब्याज में कटौती करना उसकी आर्थिक पीड़ा को और बढ़ाना है। किसान को उसकी पूरी ब्याज राशि बिना किसी कटौती के मिलनी चाहिए।

25 किलोमीटर दूरी का प्रावधान और बढ़ता एकाधिकार

प्रस्तावित आदेश के क्लॉज़ 6A में चीनी मिलों के बीच न्यूनतम दूरी 15 किलोमीटर से बढ़ाकर 25 किलोमीटर करने का प्रस्ताव है। देखने में यह तकनीकी बदलाव लग सकता है, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम होंगे। इससे बड़े उद्योग समूहों के लिए एकाधिकार क्षेत्र (Monopoly Zone) बन जाएंगे। किसानों के पास अपनी उपज बेचने के विकल्प कम हो जाएंगे। यदि किसी क्षेत्र में केवल एक मिल होगी तो किसान उसी पर निर्भर हो जाएगा, चाहे वह भुगतान समय पर करे या नहीं।

प्रतिस्पर्धा समाप्त होने का सीधा नुकसान किसान को होगा। जब खरीदार कम होंगे तो किसानों की मोलभाव करने की शक्ति कमजोर हो जाएगी। यह प्रावधान छोटे और मध्यम उद्योगों के लिए भी नुकसानदायक है क्योंकि नई इकाइयों की स्थापना कठिन हो जाएगी। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में प्रतिस्पर्धा हमेशा किसानों के हित में रही है। इसलिए 15 किलोमीटर की वर्तमान सीमा को बनाए रखना आवश्यक है।

छोटी खंडसारी और कोल्हू इकाइयों पर संकट

गांवों में छोटे स्तर पर चलने वाली खंडसारी और कोल्हू इकाइयां केवल व्यापारिक केंद्र नहीं होतीं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होती हैं। प्रस्तावित आदेश में इन इकाइयों के लिए लाइसेंस अनिवार्य करने का प्रावधान रखा गया है। यह कदम छोटे किसानों और ग्रामीण उद्यमिता पर सीधा हमला है। आज भी हजारों किसान अपने गांवों में छोटे कोल्हू चलाकर गुड़ और खंडसारी बनाते हैं। इससे गांव में रोजगार पैदा होता है, स्थानीय व्यापार चलता है और किसानों को अतिरिक्त आय मिलती है। यदि इन इकाइयों पर अत्यधिक नियम और लाइसेंस का बोझ डाला गया तो छोटे किसान इस क्षेत्र से बाहर हो जाएंगे और पूरा बाजार बड़ी मिलों के हाथ में चला जाएगा। यह ग्रामीण आत्मनिर्भरता को खत्म करने की दिशा में खतरनाक कदम होगा।

ढुलाई खर्च का अन्यायपूर्ण बोझ

प्रस्तावित आदेश में गन्ना ढुलाई पर किसानों से 60 पैसे प्रति क्विंटल की जगह 12 रुपये प्रति क्विंटल तक कटौती का प्रावधान किया गया है। यह स्पष्ट रूप से किसान विरोधी निर्णय है। किसान की जिम्मेदारी अपने खेत से गन्ना खरीद केंद्र तक फसल पहुंचाने तक होनी चाहिए। सेंटर से मिल तक गन्ना ले जाने का खर्च मिलों को उठाना चाहिए। पहले ही खेती की लागत तेजी से बढ़ रही है। डीजल, खाद, मजदूरी और सिंचाई सब महंगे हो चुके हैं। ऐसे समय में अतिरिक्त ढुलाई खर्च किसानों पर डालना उनकी आय को और कम करेगा।

एफआरपी और एसएपी पर बढ़ता नियंत्रण

गन्ना मूल्य निर्धारण को लेकर भी प्रस्तावित आदेश कई सवाल खड़े करता है। खंडसारी और मिलों के लिए गन्ना खरीद के अधिकतम मूल्य की सीमा तय करना बाजार प्रतिस्पर्धा को खत्म करेगा। इसके अलावा, प्रस्ताव में यह व्यवस्था की गई है कि राज्य सरकारें केंद्र की सहमति के बिना SAP (State Advised Price) नहीं बढ़ा सकेंगी। यह केवल किसान विरोधी ही नहीं बल्कि संघीय ढांचे पर भी हमला है।

भारत का संविधान राज्यों को कृषि और कृषि मूल्य निर्धारण से जुड़े अधिकार देता है। अलग-अलग राज्यों की लागत, उत्पादन क्षमता और आर्थिक परिस्थितियां अलग होती हैं। ऐसे में राज्यों को अपनी परिस्थितियों के अनुसार मूल्य तय करने का अधिकार होना चाहिए। यदि केंद्र सरकार हर निर्णय को नियंत्रित करेगी तो राज्यों की स्वायत्तता कमजोर होगी और किसानों के हित प्रभावित होंगे।

रिकवरी रेट और किसानों की आर्थिक हानि

FRP निर्धारण में रिकवरी रेट 8 प्रतिशत से बढ़ाकर 10.25 प्रतिशत करना किसानों के लिए भारी नुकसान का कारण बना है। इसका अर्थ यह है कि अब वही मूल्य पाने के लिए किसानों को अधिक रिकवरी वाला गन्ना देना पड़ेगा। जिन क्षेत्रों में प्राकृतिक या जलवायु कारणों से रिकवरी कम होती है, वहां के किसानों को सीधा नुकसान उठाना पड़ रहा है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि रिकवरी मापने की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी नहीं है। किसान मिलों द्वारा बताए गए आंकड़ों पर निर्भर रहता है। इसलिए रिकवरी रेट का तृतीय पक्ष सत्यापन अनिवार्य होना चाहिए ताकि किसानों के साथ किसी प्रकार की हेराफेरी न हो सके।

FRP वृद्धि और बढ़ती महंगाई

05 मई को केंद्र सरकार ने गन्ने का FRP 365 रुपये प्रति क्विंटल घोषित किया। यह वृद्धि केवल 2.81 प्रतिशत है, जबकि सरकारी आंकड़ों के अनुसार महंगाई दर इससे अधिक है। यदि खेती की लागत 4 से 6 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है और किसानों की आय केवल 2 से 3 प्रतिशत बढ़ाई जा रही है, तो इसका अर्थ है कि किसान की वास्तविक आय घट रही है। कृषि केवल उत्पादन का प्रश्न नहीं है, बल्कि सम्मानजनक आय का भी प्रश्न है। यदि किसान को उसकी लागत और श्रम के अनुरूप मूल्य नहीं मिलेगा तो खेती लगातार घाटे का सौदा बनती जाएगी।

डिजिटल ट्रैकिंग और पारदर्शिता की आवश्यकता

गन्ना खरीद और भुगतान प्रणाली में पारदर्शिता की कमी लंबे समय से विवाद का कारण रही है। खरीद से लेकर भुगतान तक पूरी प्रक्रिया की डिजिटल ट्रैकिंग अनिवार्य की जानी चाहिए। यदि हर किसान को यह जानकारी वास्तविक समय में उपलब्ध हो कि उसका कितना गन्ना खरीदा गया, किस दर पर खरीदा गया और भुगतान कब तक होगा, तो विवादों और भ्रष्टाचार में बड़ी कमी आ सकती है। इसके साथ ही एक गन्ना कॉर्पस फंड बनाया जाना चाहिए जिससे किसानों को 24 घंटे के भीतर भुगतान सुनिश्चित किया जा सके।

आदेश लागू करने से पहले परस्पर संवाद की आवश्यकता

गन्ना (नियंत्रण) आदेश, 2026 केवल एक प्रशासनिक दस्तावेज नहीं है। यह आने वाले वर्षों में भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कृषि बाजार और किसान-मिल संबंधों की दिशा तय करेगा। यदि यह आदेश वर्तमान स्वरूप में लागू होता है तो इससे बड़े उद्योग समूहों को लाभ और किसानों की निर्भरता बढ़ने की आशंका है। किसानों की आय, राज्यों के अधिकार, ग्रामीण उद्यमिता और बाजार प्रतिस्पर्धा — सभी पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

सरकार को चाहिए कि वह इस आदेश को जल्दबाजी में लागू करने के बजाय किसान संगठनों, राज्य सरकारों और कृषि विशेषज्ञों के साथ व्यापक संवाद करे। भारत की कृषि व्यवस्था केवल उद्योग आधारित मॉडल पर नहीं चल सकती। यहां गांव, किसान, स्थानीय उद्योग और सामाजिक संतुलन सब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। यदि नीति निर्माण में किसान केंद्र में नहीं होगा, तो कोई भी सुधार अंततः असंतुलन और असंतोष को जन्म देगा। आज आवश्यकता इस बात की है कि गन्ना नीति का उद्देश्य केवल चीनी और एथेनॉल उत्पादन बढ़ाना न होकर किसानों की आय, ग्रामीण रोजगार और आर्थिक न्याय सुनिश्चित करना हो। तभी वास्तविक अर्थों में कृषि सुधार संभव होगा।

लेखक: मनीष भारती (मनीष भारती उत्तर प्रदेश के मेरठ के एक प्रगतिशील किसान और नेता हैं, जो विशेष रूप से खेती और डेयरी व्यवसाय में अपनी अभिनव पहलों के लिए जाने जाते हैं।)

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