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चीनी उत्पादन बढ़ा, इथेनॉल नीति और एमएसपी पर इंडस्ट्री की मांग

sugar mills Ethanol Policy

नई दिल्ली: देश में चालू चीनी सत्र 2025-26 के दौरान उत्पादन में करीब 8 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसके बावजूद इथेनॉल क्षेत्र और चीनी मिलों की वित्तीय स्थिति को लेकर चिंता बनी हुई है। इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ने सरकार से इथेनॉल नीति में तेजी लाने और न्यूनतम विक्रय मूल्य में संशोधन की मांग की है। संघ का कहना है कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम को तेज करना आवश्यक हो गया है। देश में लगभग 2000 करोड़ लीटर इथेनॉल उत्पादन क्षमता मौजूद है, जिसमें अनाज आधारित उत्पादन भी शामिल है।

इथेनॉल मिश्रण बढ़ाने की जरूरत

इंडस्ट्री ने मौजूदा स्तर से आगे बढ़ते हुए उच्च मिश्रण स्तरों पर विचार करने की आवश्यकता जताई है। साथ ही लचीले ईंधन वाहनों को तेजी से लागू करने और कर ढांचे को सरल बनाने की मांग भी की गई है। संघ के अनुसार इथेनॉल की खरीद कीमतों में संशोधन न होने और कम आवंटन के कारण उत्पादन क्षमता का पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा है, जिससे भंडार बढ़ रहा है।

चीनी उत्पादन में हुई वृद्धि

ताजा आंकड़ों के अनुसार 15 अप्रैल तक देश का कुल चीनी उत्पादन बढ़कर 274.8 लाख टन पहुंच गया है, जो पिछले वर्ष इसी अवधि में 254.96 लाख टन था। हालांकि उत्पादन में वृद्धि हुई है, लेकिन सक्रिय मिलों की संख्या घटकर 19 रह गई है, जबकि पिछले वर्ष इस समय 38 मिलें संचालित थीं।

राज्यवार उत्पादन का हाल

उत्तर प्रदेश में उत्पादन 89.26 लाख टन दर्ज किया गया है, जो पिछले वर्ष के 91.10 लाख टन से थोड़ा कम है। वर्तमान में यहां केवल 6 मिलें चल रही हैं, जबकि पिछले वर्ष इसी समय 22 मिलें संचालित थीं। वहीं महाराष्ट्र में 99.3 लाख टन और कर्नाटक में 48.10 लाख टन उत्पादन दर्ज किया गया है। इन राज्यों में मुख्य सत्र के लिए मिलें बंद हो चुकी हैं, हालांकि कर्नाटक में जून-जुलाई से विशेष सत्र में कुछ मिलों के दोबारा शुरू होने की संभावना है। तमिलनाडु में भी कुछ मिलों में पेराई जारी है।

किसानों के भुगतान पर बढ़ा दबाव

संघ ने बताया कि उत्पादन लागत बढ़ने और कीमतों में कमजोरी के कारण मिलों की नकदी स्थिति प्रभावित हो रही है, जिससे गन्ना किसानों के बकाया भुगतान बढ़ रहे हैं। साथ ही घरेलू खपत पर भी असर पड़ा है।

नीतिगत फैसलों से मिलेगी राहत

इंडस्ट्री को उम्मीद है कि समय पर नीतिगत फैसले लिए जाने से उत्पादन क्षमता का बेहतर उपयोग हो सकेगा, मिलों की आर्थिक स्थिति सुधरेगी और किसानों को समय पर भुगतान मिल पाएगा। इससे न केवल बाजार में स्थिरता आएगी बल्कि ऊर्जा सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।

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