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गर्मी में पालक की खेती से कई बार कटाई कर किसान बढ़ा सकते हैं कमाई

Spinach cultivation in summer

नई दिल्ली: हरी और पत्तेदार सब्जियों में पालक का महत्वपूर्ण स्थान है। कम समय में तैयार होने वाली इस फसल की मांग वर्षभर बनी रहती है और इसकी पत्तियों का उपयोग सब्जी, साग तथा कई अन्य खाद्य पदार्थों में किया जाता है। पालक को सामान्य तौर पर ठंडे मौसम की फसल माना जाता है, लेकिन उचित किस्म, सिंचाई और खेत प्रबंधन के साथ गर्मी के मौसम में भी इसकी खेती की जा सकती है। इसकी खास बात यह है कि एक बार फसल की बुवाई करने के बाद उचित देखभाल के साथ कई बार पत्तियों की कटाई की जा सकती है, जिससे किसान को एक ही फसल से बार-बार उपज प्राप्त करने का अवसर मिलता है।

पालक की खेती के लिए उपयुक्त समय

पालक की मुख्य बुवाई सितंबर से नवंबर के बीच की जाती है। इस अवधि में मौसम अपेक्षाकृत अनुकूल रहने के कारण पालक की बढ़वार अच्छी हो सकती है। हालांकि इसकी खेती केवल ठंड के मौसम तक सीमित नहीं है। किसान क्षेत्र की जलवायु, तापमान, सिंचाई की सुविधा और पालक की उपयुक्त किस्म का चयन करते हुए वर्षा तथा गर्मी के मौसम में भी इसकी खेती कर सकते हैं। गर्मी में खेती करने वाले किसानों के लिए खेत में पर्याप्त नमी बनाए रखना और अत्यधिक तापमान के दौरान फसल को उचित सिंचाई उपलब्ध कराना विशेष रूप से महत्वपूर्ण होता है।

गर्मी में खेती के दौरान सिंचाई पर दें ध्यान

गर्मी के मौसम में तापमान अधिक होने के कारण खेत की मिट्टी में नमी तेजी से कम हो सकती है। पालक की कोमल पत्तियों और तेज बढ़वार के लिए पर्याप्त नमी जरूरी होती है। इसलिए किसान को मिट्टी की स्थिति देखकर समय पर सिंचाई करनी चाहिए। हालांकि खेत में पानी जमा नहीं होने देना चाहिए, क्योंकि अत्यधिक नमी से जड़ों को नुकसान पहुंच सकता है और रोगों का खतरा बढ़ सकता है। गर्मी में हल्की मिट्टी वाले खेतों में सिंचाई की आवश्यकता भारी मिट्टी की तुलना में अधिक हो सकती है।

पालक की खेती के लिए खेत की तैयारी

पालक की अच्छी फसल के लिए खेत की तैयारी पर विशेष ध्यान देना जरूरी है। सबसे पहले मिट्टी पलटने वाले हल से एक बार गहरी जुताई करनी चाहिए। इससे खेत में पहले से मौजूद खरपतवारों की जड़ें और कई हानिकारक कीटों के अंडे या लार्वा नष्ट करने में मदद मिल सकती है। इसके बाद खेत की मिट्टी को अच्छी तरह तैयार करने के लिए दो से तीन बार हल्की जुताई की जा सकती है। अंतिम जुताई के बाद पाटा लगाकर मिट्टी को भुरभुरा और समतल करना चाहिए, जिससे बीजों को समान गहराई पर बोने में सुविधा होती है और अंकुरण भी बेहतर हो सकता है।

भुरभुरी मिट्टी पालक की अच्छी बढ़वार के लिए जरूरी

पालक की जड़ें अपेक्षाकृत कोमल होती हैं, इसलिए खेत में मिट्टी का बहुत अधिक सख्त होना फसल की शुरुआती बढ़वार को प्रभावित कर सकता है। खेत तैयार करते समय मिट्टी को अच्छी तरह भुरभुरा करना जरूरी है। खेत में बड़े-बड़े ढेले नहीं रहने चाहिए और पानी की निकासी की व्यवस्था भी ठीक होनी चाहिए। समतल एवं अच्छी तरह तैयार खेत में क्यारियां बनाने से सिंचाई और फसल प्रबंधन भी आसान हो जाता है।

खेत तैयार करते समय करें उर्वरक प्रबंधन

पालक की अच्छी पैदावार के लिए खेत में पर्याप्त पोषक तत्वों की उपलब्धता जरूरी है। दिए गए कृषि प्रबंधन के अनुसार अंतिम जुताई से पहले प्रति एकड़ खेत में 20 किलोग्राम नाइट्रोजन, 20 किलोग्राम फास्फोरस और 24 किलोग्राम पोटाश का उपयोग किया जा सकता है। इसके साथ प्रति एकड़ लगभग 10 से 20 टन अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद खेत में मिलाई जा सकती है। जैविक पदार्थों की उपलब्धता बढ़ाने के लिए किसान गोबर की खाद के साथ नीम की खली का भी प्रयोग कर सकते हैं। हालांकि उर्वरकों की वास्तविक मात्रा मिट्टी की जांच, क्षेत्र और फसल की जरूरत के अनुसार तय करना अधिक उचित होता है।

जैविक खाद से मिट्टी की गुणवत्ता में मिल सकती है मदद

अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद खेत में जैविक पदार्थ बढ़ाने और मिट्टी की संरचना सुधारने में मदद कर सकती है। इससे मिट्टी में नमी धारण करने की क्षमता बेहतर हो सकती है और पौधों को पोषक तत्वों की उपलब्धता में भी सहायता मिलती है। किसान को हमेशा अच्छी तरह सड़ी हुई खाद का ही प्रयोग करना चाहिए। कच्ची गोबर की खाद का अत्यधिक उपयोग करने से खेत में खरपतवार और कुछ कीटों की समस्या बढ़ सकती है।

पालक की बुवाई की सही विधि

पालक की बुवाई सामान्य तौर पर छिड़काव विधि से भी की जाती है, लेकिन व्यवस्थित खेती और बेहतर फसल प्रबंधन के लिए क्यारियों में बुवाई करना अधिक सुविधाजनक हो सकता है। क्यारियां तैयार करते समय उनके बीच लगभग 20 से 25 सेंटीमीटर की दूरी रखी जा सकती है। बीजों की बुवाई लगभग 10 से 15 सेंटीमीटर की दूरी पर करने की सलाह दी जाती है। बीजों को बहुत अधिक गहराई में बोने के बजाय लगभग 2 से 3 सेंटीमीटर की गहराई पर बोना उचित माना जाता है। इससे बीजों को अंकुरण के लिए आवश्यक नमी और अनुकूल वातावरण मिल सकता है।

क्यारियों में बुवाई से कटाई और देखभाल होती है आसान

क्यारियों में पालक की बुवाई करने से खेत में सिंचाई, निराई-गुड़ाई और कटाई का काम व्यवस्थित तरीके से किया जा सकता है। पौधों के बीच पर्याप्त दूरी रहने से उनकी बढ़वार के लिए जगह मिलती है और किसान फसल की स्थिति पर आसानी से नजर रख सकता है। गर्मी के मौसम में क्यारियों की व्यवस्था इस तरह करनी चाहिए कि सिंचाई का पानी समान रूप से पहुंच सके और खेत के किसी हिस्से में पानी जमा न हो।

एक बार बुवाई के बाद कई बार ले सकते हैं कटाई

पालक की खेती की प्रमुख विशेषता यह है कि उचित प्रबंधन के साथ इसकी पत्तियों की एक से अधिक बार कटाई की जा सकती है। पहली कटाई के बाद खेत में बचे स्वस्थ पौधों की देखभाल करने पर दोबारा नई पत्तियां निकल सकती हैं। इस तरह किसान एक ही बुवाई से कई बार बाजार के लिए हरी पालक प्राप्त कर सकता है। हालांकि कटाई की संख्या और कुल उत्पादन किस्म, मौसम, मिट्टी, सिंचाई, पोषण तथा फसल प्रबंधन पर निर्भर करता है।

बाजार की मांग के अनुसार करें कटाई

पालक की कटाई का सही समय उसकी गुणवत्ता और बाजार भाव को प्रभावित कर सकता है। बहुत अधिक पुरानी पत्तियां बाजार में अपेक्षाकृत कम पसंद की जा सकती हैं, जबकि कोमल और ताजी पत्तियों की मांग अधिक रहती है। इसलिए किसान को स्थानीय बाजार की मांग और खरीदारों की पसंद को ध्यान में रखते हुए कटाई करनी चाहिए। गर्मी के मौसम में कटाई के बाद पालक को अधिक समय तक खेत में खुला छोड़ने के बजाय जल्द बाजार तक पहुंचाने से उसकी ताजगी बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

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