उत्तराखंड में अब पारंपरिक पशुपालन को आधुनिक स्वरूप देने की दिशा में अहम पहल की जा रही है। राज्य सरकार ने बद्री नस्ल की देसी गायों पर एक विशेष सर्वे और रिसर्च प्रोजेक्ट शुरू किया है, जिसका उद्देश्य दूध उत्पादन बढ़ाना, नस्ल सुधार करना और बद्री गाय की जैविक और पोषण संबंधी खूबियों को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित करना है। यह सर्वे नैनीताल, चंपावत, अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ जिलों में किया जा रहा है, जहां कुल 3240 बद्री गायों को अध्ययन के लिए चुना गया है।
बद्री गाय उत्तराखंड की एक पारंपरिक और स्थानीय नस्ल है, जिसे लोग “कामधेनु” भी कहते हैं। इसकी खासियत यह है कि इसका दूध न केवल स्वादिष्ट होता है, बल्कि औषधीय गुणों से भी भरपूर माना जाता है। इसका मुख्य कारण है दूध में मौजूद ए2 प्रोटीन और उच्च फैट कंटेंट। यही तत्व इसे अन्य नस्लों की तुलना में ज्यादा पोषक बनाते हैं। एनिमल न्यूट्रीशन एक्सपर्ट डॉ. वीके सिंह बताते हैं कि बद्री गाय के दूध में मौजूद ए2 प्रोटीन शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने में सहायक होता है और यह कई बीमारियों से लड़ने की शक्ति भी देता है। यही वजह है कि इस दूध और इससे बने घी की मांग बाजार में काफी अधिक है और इसके दाम भी मुंहमांगे मिलते हैं।
बद्री गाय रोजाना करीब डेढ़ से दो लीटर दूध देती है, जो मात्रा में भले कम हो लेकिन गुणवत्ता में बेहतरीन होता है। इसी वजह से अब इस नस्ल पर गहन अध्ययन की आवश्यकता महसूस की गई। उत्तराखंड सरकार ने राष्ट्रीय गोकुल मिशन और राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के सहयोग से चार जिलों में 45 मिल्क रिकॉर्डिंग सेंटर खोले हैं, जहां हर दिन इन गायों के दूध देने का समय और मात्रा रिकॉर्ड की जा रही है। इसके अलावा हर गाय की जियो टैगिंग की जा रही है और उसका टिश्यू व ब्लड सैंपल लेकर गुजरात स्थित केंद्र को विश्लेषण के लिए भेजा जा रहा है। यह पूरा डेटा ‘भारत पशुधन ऐप’ के माध्यम से केंद्रीयकृत रूप से संकलित किया जा रहा है।
राज्य में इस सर्वे के अंतर्गत चंपावत, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ और नैनीताल के कुल 90 गांवों में यह रिसर्च चल रहा है। हर जिले में करीब 800 से 820 गायों को इस अध्ययन में शामिल किया गया है। इस कार्य में उत्तराखंड कोऑपरेटिव डेयरी फेडरेशन भी सहयोग कर रही है। खास बात यह है कि उत्तराखंड देश का पांचवां राज्य बन गया है जहां किसी स्थानीय गाय की नस्ल पर इस तरह का वैज्ञानिक शोध और डेटा संग्रहण किया जा रहा है। इससे पहले गुजरात, केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में ऐसी पहल हो चुकी है।
यह सर्वे न केवल राज्य में पशुपालन की नई संभावनाएं खोलेगा, बल्कि देसी नस्लों को संरक्षित करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा। इससे एक तरफ किसानों की आय बढ़ेगी, वहीं दूसरी ओर उपभोक्ताओं को शुद्ध, पोषक और औषधीय गुणों से भरपूर दूध और उससे बने उत्पाद मिल सकेंगे। बद्री गाय का वैज्ञानिक और सुनियोजित विकास भविष्य में उत्तराखंड को एक जैविक दुग्ध उत्पादन केंद्र के रूप में स्थापित कर सकता है।

