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तिल की खेती परंपरागत खेती के मुक़ाबले है कई गुना अधिक मुनाफे वाली

खरीफ सीजन में तिल की खेती अब केवल परंपरा तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह किसानों के लिए एक लाभकारी और वैज्ञानिक विकल्प के रूप में उभर रही है। कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को वैज्ञानिक पद्धति से तिल की खेती करने की सलाह दी है, जिससे उन्हें कम लागत में अधिक मुनाफा और बेहतर उत्पादन मिल सके। राज्य में तिल का कुल क्षेत्रफल लगभग 4.17 लाख हेक्टेयर है और यह देश के कुल तिल उत्पादन में लगभग 25% का योगदान देता है। विशेषज्ञों के अनुसार तिल की बुवाई का सबसे उपयुक्त समय जुलाई के मध्य तक होता है। अच्छी उपज के लिए खेत में जलभराव नहीं होना चाहिए और बीजों को 3 से 4 सेंटीमीटर गहराई पर बोना चाहिए। पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 10 सेंटीमीटर रखनी चाहिए।

तिल की उन्नत किस्मों में सावित्री, गुजरात तिल-10, गुजरात तिल-20, टाइप 78, शेखर, प्रगति, तरुण, आरटी-351, आरटी-346 और आरटी-372 प्रमुख हैं। प्रति हेक्टेयर 3 से 4 किलो बीज की जरूरत होती है। फैलोडी रोग से बचाव के लिए फोरेट 10जी दवा का 15 किलो प्रति हेक्टेयर प्रयोग करने की सिफारिश की जाती है। तिल केवल आर्थिक दृष्टि से नहीं, बल्कि पोषण के लिहाज से भी बेहद महत्वपूर्ण फसल है। इसके तेल में कैल्शियम, आयरन, मैग्नीशियम, जिंक और सेलेनियम जैसे तत्व पाए जाते हैं, जो हृदय स्वास्थ्य, बच्चों की हड्डियों के विकास और त्वचा की देखभाल में सहायक होते हैं। यह तेल त्वचा को पोषण देता है और आयुर्वेद में भी इसे औषधीय माना गया है।

मृदा विशेषज्ञों की मानें तो तिल की बेहतर उपज के लिए प्रति हेक्टेयर 30 किलो नत्रजन, 20 किलो फास्फोरस, 30 किलो पोटाश और 25 किलो गंधक का संतुलित प्रयोग करना चाहिए। इससे फसल की उत्पादकता के साथ गुणवत्ता में भी सुधार होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान तिल की खेती को वैज्ञानिक तरीकों से करें, तो यह न केवल उनकी आमदनी बढ़ाने में मदद करेगा, बल्कि कम पानी और संसाधन में अधिक लाभ देने वाली फसल के रूप में उभरेगा। तिल की वैज्ञानिक खेती राज्य में कृषि आय और पोषण सुरक्षा दोनों को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

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