नई दिल्ली: हल्दी भारत की एक प्रमुख और अत्यंत लाभकारी मसाला फसल है, जिसकी मांग बाजार में वर्षभर बनी रहती है। इसका उपयोग भोजन पकाने से लेकर औषधीय निर्माण, सौंदर्य प्रसाधनों और धार्मिक कार्यों में व्यापक स्तर पर किया जाता है। हल्दी की खेती मुख्य रूप से गर्म और आर्द्र जलवायु में की जाती है, जिसके लिए मध्यम से अधिक वर्षा की आवश्यकता होती है। मानसून के आगमन के साथ ही जून-जुलाई के महीने में इसकी बुआई का काम शुरू हो जाता है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार यदि सही प्रबंधन और आधुनिक पद्धतियों को अपनाकर हल्दी की खेती की जाए, तो यह किसानों के लिए कम जोखिम में बम्पर कमाई करने का एक सशक्त जरिया बन सकती है।
बलुई दोमट मिट्टी खेत की तैयारी और बीजारोपण की सही तकनीक
हल्दी की बेहतर पैदावार के लिए जल निकासी वाली दोमट, काली या लाल मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है, क्योंकि खेत में जलजमाव होने से इसकी गांठें सड़ने लगती हैं। बुआई से पूर्व खेत की अच्छी तरह से जुताई करके उसमें सड़ी हुई गोबर की खाद को समान रूप से मिलाना अनिवार्य होता है। हल्दी की खेती में बीज के रूप में पुरानी स्वस्थ गांठों का उपयोग किया जाता है, जिन्हें मिट्टी में पांच से सात सेंटीमीटर की गहराई पर बोया जाता है। पौधों के समुचित विकास और वायु संचार के लिए दो पौधों के बीच बीस से पच्चीस सेंटीमीटर की दूरी रखना बेहद आवश्यक होता है, जिससे गांठों का आकार बड़ा और वजनदार बनता है।
सिंचाई प्रबंधन फसल सुरक्षा और हल्दी की खुदाई का सही समय
हल्दी की फसल को नियमित सिंचाई की आवश्यकता होती है, इसलिए बारिश न होने की स्थिति में प्रति दस से पंद्रह दिनों के अंतराल पर हल्की सिंचाई करते रहना चाहिए। फसल को बीमारियों से बचाने के लिए समय-समय पर निराई-गुड़ाई करके खरपतवार निकालना तथा पत्ता झुलसा व कंद सड़न रोग के नियंत्रण हेतु जैविक या रासायनिक दवाओं का छिड़काव करना जरूरी है। हल्दी की फसल लगभग सात से नौ महीनों में पूरी तरह पककर तैयार हो जाती है, जिसकी पहचान पत्तियों के सूखकर पीले पड़ने से होती है। खुदाई के उपरांत गांठों को धोकर, उबालकर और धूप में सुखाकर प्रसंस्करण किया जाता है। सही किस्म और वैज्ञानिक तकनीक अपनाकर किसान प्रति एकड़ लाखों रुपये का शुद्ध मुनाफा आसानी से कमा सकते हैं।
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