नई दिल्ली: पिछले 75 वर्षों में आलू उत्पादन के मामले में भारत ने ऐतिहासिक तरक्की की है। साल 1949 में जहां देश में केवल 15 लाख टन आलू का उत्पादन होता था, वहीं अब यह आंकड़ा 600 लाख टन के पार पहुंच चुका है। इस उपलब्धि के साथ भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा आलू उत्पादक देश बन गया है।
हालांकि, इस सफलता के बावजूद किसानों की मुश्किलें कम नहीं हुई हैं। जब भी बंपर पैदावार होती है, बाजार में आलू के दाम गिरकर 400 से 500 रुपये प्रति क्विंटल तक आ जाते हैं, जिससे किसानों को लागत निकालना भी मुश्किल हो जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि भारत में आज भी आलू को केवल एक सब्जी के तौर पर देखा जाता है, जबकि वैश्विक स्तर पर इसे एक औद्योगिक फसल माना जाता है।
ग्लोबल बाजार में आलू प्रोसेसिंग की भारी मांग
दुनिया भर में आलू से बनने वाले प्रोसेस्ड उत्पाद जैसे चिप्स, फ्रेंच फ्राइज़ और पाउडर का बाजार करीब 3.72 लाख करोड़ रुपये का है, जो 2031 तक बढ़कर 5.45 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान है। जानकारों के मुताबिक, अगर भारतीय किसानों को उनकी फसल का सही दाम दिलाना है, तो आलू को सिर्फ मंडियों तक सीमित रखने के बजाय फैक्ट्रियों और वैश्विक बाजार से जोड़ना होगा।
गुजरात का मॉडल बना मिसाल
आलू से कमाई कैसे की जाती है, इसका बेहतरीन उदाहरण गुजरात है। उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल भले ही उत्पादन में आगे हों, लेकिन कमाई के मामले में गुजरात के किसान आगे निकल चुके हैं।
पिछले 20 वर्षों में गुजरात ने आलू प्रोसेसिंग पर फोकस किया। आज वहां कुल प्रोसेस्ड आलू का करीब 60 फीसदी वेफर्स और 40 फीसदी फ्रेंच फ्राइज़ बनाने में इस्तेमाल होता है। यहां के किसान सीधे कंपनियों से जुड़े हैं और कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के जरिए उन्हें बाजार के उतार-चढ़ाव का जोखिम नहीं उठाना पड़ता।
कंपनी प्रतिनिधियों के अनुसार, गुजरात में बुवाई के समय ही दाम तय कर लिए जाते हैं, जिससे किसानों को कम से कम 10 रुपये प्रति किलो का गारंटीड रेट मिल जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह मॉडल उत्तर प्रदेश, बिहार और अन्य राज्यों में अपनाया जाए, तो किसानों की आय में बड़ा सुधार हो सकता है।
भारत क्यों बन सकता है दुनिया का आलू हब
केन्द्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (CPRI), शिमला के निदेशक डॉ. ब्रजेश कुमार सिंह के अनुसार, भारत के पास दुनिया का आलू हब बनने की सबसे बड़ी ताकत उसका मौसम है। जब यूरोप और अन्य देशों में कड़ाके की ठंड के कारण खेती मुश्किल होती है, उसी समय भारत का करीब 90 फीसदी ताजा आलू तैयार होता है।
इसके अलावा, भारत में आलू उत्पादन की लागत भी कई देशों की तुलना में कम है। अगर प्रोसेस्ड आलू उत्पादों पर ध्यान दिया जाए, तो भारत मलेशिया, फिलीपींस, इंडोनेशिया और थाईलैंड जैसे बड़े बाजारों में अपनी पकड़ मजबूत कर सकता है। साथ ही खाड़ी देशों और यूरोप में भी भारतीय आलू की भारी मांग है।
सर्टिफिकेशन और कोल्ड चेन बनी सबसे बड़ी बाधा
इतनी संभावनाओं के बावजूद भारत वैश्विक आलू बाजार में पीछे है। इसकी सबसे बड़ी वजह सर्टिफिकेशन, क्वालिटी कंट्रोल और कोल्ड चेन की कमी है। विदेशी बाजार सख्त मानकों पर खरी उतरने वाला आलू ही स्वीकार करते हैं, जिसमें कीटनाशकों का सीमित इस्तेमाल और बेहतर पैकेजिंग जरूरी होती है। जानकारों के मुताबिक, भारत का अभी तक कोई मजबूत अंतरराष्ट्रीय आलू ब्रांड नहीं बन पाया है। जब तक अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार पैकेजिंग, भंडारण और गुणवत्ता सुधार नहीं होगा, तब तक भारत वैश्विक लीडर नहीं बन पाएगा।
कच्चा आलू बेचने से नहीं होगी किसानों की भलाई
डॉ. ब्रजेश सिंह के अनुसार, भारत अपने कुल आलू का केवल 8 फीसदी ही प्रोसेस कर पाता है, जबकि चीन करीब 15 फीसदी आलू प्रोसेस करता है। अमेरिका और यूरोप जैसे विकसित देशों में यह आंकड़ा 30 से 67 फीसदी तक है। अनुमान है कि 2050 तक केवल प्रोसेसिंग के लिए ही 250 लाख टन आलू की जरूरत पड़ेगी। पिछले तीन वर्षों में भारत के आलू निर्यात में 450 फीसदी की बढ़ोतरी जरूर हुई है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि यह तो बस शुरुआत है।
सरकारी नीतियां खेतों तक पहुंचाने की जरूरत
विशेषज्ञों का कहना है कि आलू क्षेत्र में क्रांति लाने के लिए सरकारी योजनाओं को कागजों से निकालकर खेतों तक पहुंचाना होगा। एक सिंगल विंडो सिस्टम की जरूरत है, जिससे छोटे किसान भी आसानी से निर्यात कर सकें। इसके साथ ही कोलकाता और विशाखापट्टनम जैसे पूर्वी बंदरगाहों को आधुनिक बनाना जरूरी है, ताकि दक्षिण-पूर्व एशिया के बाजारों तक भारतीय आलू कम समय और कम लागत में पहुंच सके।
साल 2024 के आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक आलू प्रोसेसिंग बाजार में भारत की हिस्सेदारी केवल 3.4 फीसदी है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगले पांच वर्षों में इसे कम से कम 10 फीसदी तक बढ़ाया जा सकता है। जब आलू सीधे फैक्ट्रियों में जाएगा और अंतरराष्ट्रीय बाजार से जुड़ेगा, तभी किसानों को उनकी मेहनत का सही और स्थायी दाम मिल सकेगा।
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