Site icon Krishi Pitaara

जैविक विकल्पों से बदल रही खेती, 62 गुना बढ़ा जैव-कीटनाशकों का इस्तेमाल

Organic farming is changing

पूसा: भारतीय कृषि में तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है। किसान अब केवल उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान देने के बजाय मिट्टी की गुणवत्ता, फसल सुरक्षा, खेती की लागत कम करने और पर्यावरण संरक्षण को भी प्राथमिकता दे रहे हैं। इसी बदलाव के कारण जैव-कीटनाशक, जैव उर्वरक, नीम आधारित उत्पाद, कंपोस्ट और प्राकृतिक खेती जैसे विकल्पों का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक और पादप रोग विशेषज्ञ प्रो. डॉ. एस. के. सिंह के अनुसार खेती का भविष्य पूरी तरह रासायनिक या पूरी तरह जैविक खेती में नहीं है। वैज्ञानिक और संतुलित तरीके से दोनों विकल्पों का इस्तेमाल करके रासायनिक कृषि आदानों पर अनावश्यक निर्भरता कम की जा सकती है और टिकाऊ कृषि व्यवस्था विकसित की जा सकती है।

30 वर्षों में 62 गुना बढ़ा जैव-कीटनाशकों का इस्तेमाल

पौध संरक्षण, संगरोध एवं संग्रह निदेशालय के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 1994-95 में देश में जैव और नीम आधारित कीटनाशकों का इस्तेमाल केवल 123 मीट्रिक टन था। यह मात्रा बढ़कर वर्ष 2024-25 में 7,649 मीट्रिक टन तकनीकी ग्रेड तक पहुंच गई। करीब 62 गुना की यह वृद्धि बताती है कि किसान जैव आधारित पौध संरक्षण तकनीकों को तेजी से अपना रहे हैं। इसके पीछे कीटों में बढ़ता प्रतिरोध, लाभकारी कीटों और परागण करने वाले जीवों के संरक्षण की जरूरत तथा खाद्य उत्पादों में रासायनिक अवशेषों को लेकर बढ़ती जागरूकता जैसे कारण प्रमुख हैं।

जैविक खेती का क्षेत्र लगातार बढ़ रहा

राष्ट्रीय जैविक उत्पादन कार्यक्रम के वर्ष 2024-25 के आंकड़ों के अनुसार देश में करीब 39.6 लाख हेक्टेयर क्षेत्र जैविक प्रमाणीकरण के दायरे में आ चुका है। इसमें लगभग 22.5 लाख हेक्टेयर प्रमाणित जैविक क्षेत्र है, जबकि 17.1 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में प्रमाणीकरण की प्रक्रिया चल रही है। इसी अवधि में देश में लगभग 46.99 लाख मीट्रिक टन जैविक उत्पादन दर्ज किया गया। भारत ने 3.68 लाख टन से अधिक जैविक उत्पादों का निर्यात किया और इससे करीब 5,394 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई। इससे संकेत मिलता है कि जैविक खेती पर्यावरण संरक्षण के साथ किसानों के लिए बेहतर बाजार और अतिरिक्त आय का माध्यम भी बन रही है।

प्राकृतिक खेती को भी मिल रहा सरकारी प्रोत्साहन

केंद्र सरकार ने नवंबर 2024 में राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन को मंजूरी दी थी। इस मिशन के लिए 2,481 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में मिशन के तहत 18,893 किसान समूहों के माध्यम से लगभग 10.32 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को जोड़ा गया। इस पहल में करीब 20.93 लाख किसान शामिल हुए हैं। मिशन का उद्देश्य स्थानीय संसाधनों, पशुधन आधारित कृषि आदानों और फसल विविधीकरण को बढ़ावा देकर खेती की लागत कम करना और मिट्टी के स्वास्थ्य को बेहतर बनाना है।

किसानों के पास कई जैविक विकल्प

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार ट्राइकोडर्मा जैसे लाभकारी कवक मिट्टी और बीज से होने वाले कई रोगों के नियंत्रण में उपयोगी हैं। बैसिलस और स्यूडोमोनास जैसे सूक्ष्मजीव पौधों की जड़ों के आसपास सक्रिय होकर रोग फैलाने वाले कारकों को नियंत्रित करने के साथ पौधों की वृद्धि में भी मदद कर सकते हैं। ब्यूवेरिया बैसियाना और मेटाराइजियम जैसे जैविक कारकों का इस्तेमाल कई हानिकारक कीटों के प्रबंधन में किया जाता है। वहीं नीम और अजादिरैक्टिन आधारित उत्पाद चूसक तथा पत्ती खाने वाले कीटों के नियंत्रण में उपयोग किए जा रहे हैं। पौध पोषण के लिए राइजोबियम, एजोटोबैक्टर, एजोस्पिरिलम, फॉस्फेट घुलनशील जीवाणु और माइकोराइजा जैसे जैव उर्वरकों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। वर्मी कंपोस्ट, सामान्य कंपोस्ट और हरी खाद भी मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ बढ़ाने और उसकी उर्वरता सुधारने में मदद कर सकते हैं।

जैविक उत्पाद हर समस्या का समाधान नहीं

कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार जैविक उत्पाद उपयोगी जरूर हैं, लेकिन इन्हें किसी चमत्कारी समाधान के रूप में नहीं देखना चाहिए। जीवित सूक्ष्मजीव आधारित उत्पादों को प्रभावी ढंग से काम करने के लिए उचित नमी, तापमान और पर्याप्त समय की जरूरत होती है। इसलिए विशेषज्ञ समेकित कीट एवं रोग प्रबंधन को अपनाने की सलाह देते हैं। इसमें स्वस्थ बीज, रोगरोधी किस्में, फसल चक्र, खेत की स्वच्छता, संतुलित पोषण, जैविक नियंत्रण और आवश्यकता पड़ने पर सीमित रासायनिक नियंत्रण को शामिल किया जाता है।

जैविक उत्पाद खरीदते समय गुणवत्ता जांचें

बाजार में उपलब्ध हर जैविक उत्पाद समान गुणवत्ता वाला नहीं होता। इसलिए किसानों को उत्पाद खरीदते समय उसके पंजीकरण, बैच नंबर, निर्माण और समाप्ति तिथि, भंडारण संबंधी निर्देश तथा लेबल पर दिए गए इस्तेमाल के निर्देशों की जांच करनी चाहिए। जैविक उत्पादों को तेज धूप और अधिक तापमान से बचाकर रखना भी जरूरी है। गलत तरीके से भंडारण करने पर उत्पाद में मौजूद सूक्ष्मजीवों या सक्रिय तत्वों की प्रभावशीलता कम हो सकती है।

वैज्ञानिक खेती को बनाना होगा भविष्य का आधार

प्रो. डॉ. एस. के. सिंह के अनुसार भविष्य की खेती का आधार केवल रसायनों को कम करना नहीं, बल्कि सही वैज्ञानिक तरीके अपनाना होना चाहिए। जैविक और सूक्ष्मजीव आधारित तकनीकों को वैज्ञानिक तरीके से समेकित कृषि प्रबंधन में शामिल करके खेती को अधिक टिकाऊ, लाभकारी और पर्यावरण अनुकूल बनाया जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार किसानों को किसी भी समस्या के लिए सबसे पहले उसकी सही पहचान करनी चाहिए। इसके बाद गुणवत्तापूर्ण उत्पाद का चयन, सही मात्रा और सही समय पर इस्तेमाल तथा वैज्ञानिक सलाह के आधार पर निर्णय लेना जरूरी है। इसी तरीके से जैविक विकल्प किसानों के लिए वास्तविक लाभ और टिकाऊ कृषि का मजबूत आधार बन सकते हैं।

ये भी पढ़ें: ई-विकास 2.0 से किसानों को खाद वितरण में मिलेगी बड़ी राहत

Exit mobile version