मुंबई: महाराष्ट्र समेत देश के कई राज्यों में भीषण गर्मी और पानी की कमी ने किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। अक्टूबर 2025 से अप्रैल 2026 के बीच महाराष्ट्र में करीब 1,45,606 हेक्टेयर फसल क्षेत्र प्रभावित हुआ है। वहीं मार्च 2026 में नासिक जिले में ही लगभग 18,000 एकड़ कृषि भूमि को नुकसान पहुंचा है।
देशभर में फसलों को भारी नुकसान
देश के अन्य राज्यों में भी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। 1 मार्च से 7 अप्रैल 2026 के बीच 13 राज्यों में करीब 6,27,000 हेक्टेयर फसल क्षेत्र प्रभावित हुआ है। किसानों को राहत देने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने 166.36 करोड़ रुपये के मुआवजे को मंजूरी दी है।
प्याज की फसल पर सबसे ज्यादा असर
विशेषज्ञों के अनुसार इस संकट का सबसे अधिक प्रभाव प्याज की फसल पर पड़ा है। तापमान 38 से 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जाते ही प्याज की वृद्धि प्रभावित होती है और बल्ब सही तरीके से विकसित नहीं हो पाता। अप्रैल और मई में तापमान 46 से 47 डिग्री तक पहुंचने के कारण फसल सूख गई और पत्तियां झुलस गईं।
कटाई के बाद भी बढ़ रही समस्या
प्याज की परेशानी केवल खेत तक सीमित नहीं है। कटाई के बाद नमी के असंतुलन के कारण फसल में दरारें पड़ जाती हैं और तेज धूप से जलन की समस्या बढ़ जाती है। भंडारण के दौरान सड़न और सिकुड़न से नुकसान और अधिक बढ़ रहा है।
बाजार में तेजी, कीमतों में उछाल
फसल उत्पादन घटने का असर बाजार में साफ दिखाई दे रहा है। लासलगांव मंडी में 17 मई 2026 को प्याज का औसत भाव 1,021 रुपये प्रति क्विंटल था, जो 15 जून 2026 तक बढ़कर 1,420 रुपये प्रति क्विंटल पहुंच गया। यानी एक महीने में कीमतों में 42 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है।
आगे और बढ़ सकते हैं दाम
विशेषज्ञों का मानना है कि मॉनसून के दौरान परंपरागत रूप से प्याज का भंडार कम होता है। इस बार जलवायु परिवर्तन और भंडारण में बढ़ती खराबी के कारण स्थिति और गंभीर हो सकती है। मंडियों में आवक में भी कमी देखी जा रही है, जिससे आने वाले महीनों में कीमतें और बढ़ने की आशंका है।
लाखों परिवारों पर पड़ेगा असर
प्याज की खेती से जुड़े लाखों परिवार इस संकट से प्रभावित हो सकते हैं। खेती के अलावा ग्रेडिंग, पैकिंग, भंडारण और परिवहन जैसे कार्यों में बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार मिलता है। ऐसे में उत्पादन घटने का असर पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
समय रहते उपाय जरूरी
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर सिंचाई, भंडारण और आधुनिक तकनीकों पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले समय में किसानों और उपभोक्ताओं दोनों को बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।
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