नई दिल्ली: भारत में प्याज की खेती किसानों की आय और देश की खाद्य आपूर्ति व्यवस्था के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। भारत दुनिया के प्रमुख प्याज उत्पादक देशों में शामिल है, लेकिन बड़े पैमाने पर उत्पादन के बावजूद सालभर अच्छी गुणवत्ता वाले प्याज की उपलब्धता सुनिश्चित करना अब भी एक बड़ी चुनौती है। इसकी प्रमुख वजह कटाई के बाद होने वाला नुकसान, भंडारण की सीमित सुविधाएं और बाजार में कीमतों का उतार-चढ़ाव है। इस समस्या से निपटने के लिए विकसित की गई मल्टी-मॉड्यूल प्याज भंडारण प्रणाली किसानों के लिए उपयोगी साबित हो सकती है। इसके परीक्षण में सामान्य भंडारण व्यवस्था की तुलना में कुल नुकसान को 72.81 प्रतिशत तक कम करने का दावा किया गया है।
कृषि सांख्यिकी 2025 के अनुसार, वर्ष 2024-25 में भारत में लगभग 19.8 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में प्याज की खेती हुई और कुल 3.08 करोड़ टन उत्पादन दर्ज किया गया। पिछले पांच दशकों में प्याज का रकबा और उत्पादन दोनों तेजी से बढ़े हैं। बेहतर किस्मों, सिंचाई सुविधाओं और उन्नत कृषि तकनीकों ने इस वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालांकि, जलवायु परिवर्तन और बाजार की परिस्थितियों के कारण उत्पादन तथा कीमतों में उतार-चढ़ाव की समस्या बनी हुई है।
रबी प्याज के भंडारण में सबसे ज्यादा चुनौती
देश में कुल प्याज उत्पादन का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा रबी मौसम से आता है। इसकी कटाई आमतौर पर अप्रैल-मई में होती है। रबी प्याज को लंबे समय तक सुरक्षित रखना इसलिए जरूरी है, क्योंकि मॉनसून और कम उत्पादन वाले महीनों में बाजार की मांग पूरी करने के लिए इसी भंडारित प्याज पर काफी हद तक निर्भर रहना पड़ता है। लेकिन लंबे समय तक भंडारण के दौरान प्याज में कई तरह की समस्याएं सामने आती हैं। इसका वजन घटने लगता है, गांठों में अंकुर निकल आते हैं और कई बार सड़न के कारण पूरी उपज खराब हो जाती है। अधिक तापमान, नमी, हवा का उचित आवागमन नहीं होना, कटाई के दौरान लगी चोट और सही तरीके से सुखाई नहीं होना इन नुकसानों को बढ़ाते हैं। मॉनसून के दौरान यह समस्या और गंभीर हो जाती है।
पारंपरिक भंडारण में 50 प्रतिशत से अधिक नुकसान
पारंपरिक प्राकृतिक वायु-संचार वाली भंडारण संरचनाओं की शुरुआती लागत अपेक्षाकृत कम होती है, इसलिए किसान इनका काफी इस्तेमाल करते हैं। हालांकि, तापमान और नमी की प्रतिकूल परिस्थितियों में इनकी प्रभावशीलता घट जाती है। कुछ परीक्षणों में पारंपरिक भंडारण के दौरान कुल नुकसान 50 प्रतिशत से अधिक पाया गया है। इसका सीधा असर किसानों की आमदनी पर पड़ता है। भंडारण में प्याज खराब होने से किसानों को कम कीमत पर उपज बेचनी पड़ सकती है। वहीं, बाजार में उपलब्धता घटने पर उपभोक्ताओं को भी अधिक कीमत चुकानी पड़ती है। ऐसे में वैज्ञानिक और किफायती भंडारण तकनीकों की जरूरत लगातार बढ़ रही है।
मल्टी-मॉड्यूल प्रणाली से प्याज का वैज्ञानिक भंडारण
इन्हीं चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए मल्टी-मॉड्यूल प्याज भंडारण प्रणाली विकसित की गई है। इस तकनीक में कई अलग-अलग भंडारण मॉड्यूल लगाए जाते हैं और प्रत्येक मॉड्यूल की क्षमता एक टन रखी गई है। इन सभी मॉड्यूलों को पीवीसी पाइपों के नेटवर्क के माध्यम से हवा फेंकने वाली मशीन से जोड़ा जाता है। प्रत्येक मॉड्यूल के बीच में एक खड़ी छिद्रयुक्त पाइप लगाई जाती है, जिसके जरिए प्याज के बीच हवा पहुंचाई जाती है। हवा का प्रवाह सभी हिस्सों में समान रूप से बनाए रखने के लिए विशेष वाल्व लगाए गए हैं। इससे भंडारित प्याज के आसपास हवा का बेहतर आवागमन सुनिश्चित होता है। प्याज को आसानी से बाहर निकालने के लिए मॉड्यूल के निचले हिस्से में छिद्रयुक्त प्लाईवुड की चादर लगाई गई है। इसे हल्का ढलान दिया गया है, जिससे भंडारण से प्याज निकालने में सुविधा होती है।
एक इकाई में रखे जा सकते हैं 9 टन प्याज
इस पूरी व्यवस्था को एक शेड के नीचे स्थापित किया जाता है। विकसित ढांचे का आकार 7.92 मीटर लंबा, 6.10 मीटर चौड़ा और 2.44 मीटर ऊंचा है। इसमें कुल नौ टन प्याज रखने की क्षमता है। इस प्रणाली की एक खासियत यह है कि इसे जरूरत के अनुसार अलग-अलग स्थानों पर लगाया जा सकता है। उपलब्ध जगह और हवा फेंकने वाली मशीनों की संख्या के आधार पर मॉड्यूल को एक सीधी कतार या अलग-अलग शाखाओं के रूप में व्यवस्थित किया जा सकता है। शेड के खुले किनारों पर लचीली पॉलीथीन शीट लगाई गई है, जिसे जरूरत के अनुसार खोला और बंद किया जा सकता है। इससे बारिश के दौरान भंडारित प्याज को सुरक्षित रखने में मदद मिलती है।
छह महीने में कुल नुकसान घटकर 14.07 प्रतिशत
इस भंडारण प्रणाली के परीक्षण में उत्साहजनक परिणाम सामने आए हैं। पांच टन भंडारण क्षमता के आधार पर मॉनसून के सबसे चुनौतीपूर्ण दौर में छह महीने तक प्याज रखने पर कुल नुकसान 14.07 प्रतिशत दर्ज किया गया। इसमें वजन में 11.12 प्रतिशत की कमी, अंकुरण से 0.59 प्रतिशत और सड़न से 2.36 प्रतिशत नुकसान शामिल रहा। इसके मुकाबले सामान्य भंडारण व्यवस्था में छह महीने के दौरान कुल नुकसान 51.76 प्रतिशत पाया गया। इसमें वजन में 22.15 प्रतिशत की कमी, अंकुरण से 7.65 प्रतिशत और सड़न से 21.96 प्रतिशत नुकसान शामिल था।
| नुकसान का आधार | विकसित प्रणाली | सामान्य भंडारण |
|---|---|---|
| वजन में कमी | 11.12% | 22.15% |
| अंकुरण | 0.59% | 7.65% |
| सड़न | 2.36% | 21.96% |
| कुल नुकसान | 14.07% | 51.76% |
इन आंकड़ों के अनुसार, विकसित प्रणाली सामान्य भंडारण की तुलना में कुल नुकसान को 72.81 प्रतिशत तक कम करने में सफल रही। इससे लंबे समय तक प्याज की गुणवत्ता बनाए रखने और बाजार में बेहतर कीमत मिलने की संभावना बढ़ सकती है।
किसान को प्रति टन 20,320 रुपये का शुद्ध लाभ
इस प्रणाली की लागत लगभग 1.5 लाख रुपये बताई गई है और इसकी कुल भंडारण क्षमता नौ टन है। दिए गए आर्थिक आकलन के अनुसार, यदि किसान प्याज को 10 रुपये प्रति किलोग्राम की शुरुआती बाजार कीमत पर भंडारित करता है और छह महीने बाद 40 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बेचता है, तो उसे प्रति टन लगभग 20,320 रुपये का शुद्ध लाभ मिल सकता है। इसका एक बड़ा फायदा यह है कि किसान को कटाई के तुरंत बाद कम कीमत पर प्याज बेचने की मजबूरी से राहत मिल सकती है। वह बाजार की परिस्थितियों और कीमतों को देखते हुए बिक्री का समय तय कर सकता है। इससे किसानों को बेहतर विपणन योजना बनाने और अपनी उपज का अधिक मूल्य प्राप्त करने का अवसर मिलता है।
छोटे और सीमांत किसानों के लिए भी उपयोगी
कम लागत और मॉड्यूलर बनावट के कारण यह तकनीक छोटे और सीमांत किसानों के साथ-साथ कृषि उद्यमियों तथा सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिए भी उपयोगी हो सकती है। जरूरत के अनुसार भंडारण क्षमता बढ़ाने के लिए कई इकाइयों को एक साथ लगाया जा सकता है। हालांकि, वास्तविक लाभ प्याज की गुणवत्ता, भंडारण से पहले उसकी उचित सुखाई, स्थानीय मौसम, निर्माण लागत और बिक्री के समय बाजार भाव पर निर्भर करेगा। इसलिए किसानों को इसे अपनाने से पहले स्थानीय कृषि विशेषज्ञों से तकनीकी और आर्थिक जानकारी लेना उपयोगी होगा। कुल मिलाकर, मल्टी-मॉड्यूल प्याज भंडारण प्रणाली कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण तकनीकी विकल्प बन सकती है। यदि इसे किसानों तक किफायती दरों पर पहुंचाया जाता है, तो इससे प्याज की सालभर उपलब्धता बढ़ाने, किसानों की आय में सुधार करने और बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
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