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बिहार में धान की खेती में नई चुनौती: DSR तकनीक के साथ बढ़ रहा भूरा धब्बा रोग का खतरा

पटना: बिहार में धान की खेती के तरीके में बदलाव देखने को मिल रहा है। अब अधिकतर किसान सीधी बुआई (Direct Seeding of Rice – DSR) तकनीक अपना रहे हैं, जिससे खेत की तैयारी में मेहनत कम और खर्चा घट रहा है। लेकिन इस नई पद्धति के साथ एक बड़ी समस्या सामने आई है, वो है भूरा धब्बा रोग। यह रोग कई क्षेत्रों में तेजी से फैल रहा है और फसल को भारी नुकसान पहुंचा रहा है।

रोग फैलने के प्रमुख कारण

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, इस रोग के फैलने के पीछे कई कारण हैं। खेत में संतुलित उर्वरक प्रबंधन का अभाव और समय पर सिंचाई न होना प्रमुख वजह है। लगातार एक ही फसल उगाना (फसल चक्र न अपनाना), बीज का उपचार न करना और नाइट्रोजन युक्त उर्वरक का अधिक प्रयोग भी इसके फैलाव में योगदान दे रहे हैं।

पहचान के लक्षण

भूरे, गोल या अनियमित धब्बे पत्तियों पर उभरना, जिनके चारों ओर हल्का पीला घेरा दिखाई देता है, इस रोग का मुख्य संकेत है। कई बार यह धब्बे तने और फूल वाले हिस्से तक फैल जाते हैं। रोग बढ़ने पर पौधा सूखने लगता है और दाने कम भरते हैं।

फसल पर असर

समय पर रोकथाम न होने पर पौधों की वृद्धि रुक जाती है, दाने सही से नहीं बनते और उत्पादन में 20-40% तक की गिरावट आ सकती है। गंभीर स्थिति में पूरी फसल नष्ट होने का खतरा रहता है।

रोकथाम के उपाय

खेत की नियमित निगरानी और समय पर सिंचाई

संतुलित मात्रा में NPK उर्वरक का प्रयोग

रोग दिखते ही फफूंदनाशकों का छिड़काव:

कार्बेन्डाजिम आधारित सिस्टमैटिक फंगीसाइड – 1 मिली प्रति लीटर पानी

डाइथेन एम-45 कांटेक्ट फंगीसाइड – 2 मिली प्रति लीटर पानी

छिड़काव सुबह या शाम को करें और 7-10 दिन के अंतराल पर दोहराएं

जैविक उपाय

जैविक खेती करने वाले किसान नीम का अर्क, गौमूत्र आधारित जैविक फंगीसाइड या ट्राइकोडर्मा फफूंद का उपयोग कर सकते हैं, जो शुरुआती अवस्था में रोग नियंत्रण में मददगार होते हैं।

सतर्कता ही बचाव

भूरा धब्बा रोग से बचाव के लिए किसानों को सतर्क रहना होगा। मौसम में बदलाव और अत्यधिक नमी इस रोग को बढ़ावा देती है, इसलिए फसल की नियमित जांच और खेत में पानी का संतुलन बनाए रखना जरूरी है। समय पर और सही कदम उठाकर धान की पैदावार को सुरक्षित रखा जा सकता है।

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