Site icon Agriculture| Kheti| Krishi| Farm| Farmer| Agriculture| News

NBAGR ने देश की 16 नई पशु-पक्षी नस्लों को दी मान्यता, जानिए इसके मायने

NBAGR

नई दिल्ली: राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (NBAGR), करनाल ने भारत की देसी पशु-पक्षी विरासत को संरक्षित करने की दिशा में एक और अहम कदम उठाया है. ब्यूरो ने मुर्गी, भेड़-बकरी, गाय-भैंस और बत्तख की 16 नई नस्लों को आधिकारिक रूप से रजिस्टर किया है. इस नई सूची के साथ ही देश में रजिस्टर्ड पशु-पक्षियों की कुल संख्या में और इजाफा हो गया है, जिससे जैव विविधता संरक्षण और वैज्ञानिक पशुपालन को मजबूती मिलेगी.

बत्तख और मुर्गी की देसी नस्लों को पहचान

नई रजिस्टर्ड नस्लों में बत्तख की 6 नस्लें शामिल हैं, जो अंडा उत्पादन के लिए जानी जाती हैं. इनमें असम, मणिपुर और ओडिशा की स्थानीय बत्तख नस्लों को भी मान्यता दी गई है. इसके साथ ही झारखंड की एक देसी मुर्गी नस्ल को भी रजिस्टर किया गया है, जिसे खासतौर पर मीट उत्पादन के लिए पाला जाता है. यह नस्ल स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल मानी जाती है और ग्रामीण आजीविका के लिए महत्वपूर्ण है.

इसके अलावा नागालैंड के पारंपरिक पशु मिथुन को भी NBAGR की ओर से रजिस्टर्ड टैग दिया गया है, जो उत्तर-पूर्व भारत की सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान का अहम हिस्सा है.

NBAGR कैसे करता है नस्लों का पंजीकरण

NBAGR देश में पशु-पक्षियों की नई नस्लों के पंजीकरण की नोडल संस्था है. गाय-भैंस, भेड़-बकरी और एवियन रिसर्च से जुड़े संस्थान गहन शोध के बाद अपनी रिपोर्ट ब्यूरो को भेजते हैं. इसके बाद नस्ल की उत्पादकता, अनुकूलन क्षमता, शारीरिक लक्षण और आनुवंशिक विशिष्टता जैसे सभी मानकों पर जांच की जाती है. सभी पैमानों पर खरा उतरने के बाद ही किसी नस्ल को आधिकारिक मान्यता दी जाती है.

रजिस्टर हुईं गाय, भैंस, बकरी और भेड़ की प्रमुख नस्लें

रोहिलखंडी गाय

रोहिलखंडी गाय उत्तर प्रदेश के बरेली, बदायूं और पीलीभीत जिलों में पाई जाती है. इनका रंग सामान्यतः सफेद या ग्रे होता है. सींग बाहर की ओर ऊपर मुड़े और नुकीले होते हैं, जबकि पूंछ लंबी होती है.

मेदिनी बैल

मेदिनी नस्ल के बैल झारखंड के पलामू, लातेहार और गढ़वा जिलों में पाए जाते हैं. इनका मुख्य उपयोग बोझा ढोने में किया जाता है. इनका रंग अधिकतर ग्रे होता है और कूबड़ कंधे के आगे स्थित होता है.

करण फ्राइज गाय (सिंथेटिक)

करण फ्राइज एक सिंथेटिक नस्ल है, जिसे ICAR-NDRI ने विकसित किया है. यह होलस्टीन फ्राइजियन और थारपारकर नस्लों की क्रॉस ब्रीडिंग से बनी है. इसे हरियाणा के करनाल, कुरुक्षेत्र, पानीपत, कैथल, जींद और यमुनानगर जिलों में पाला जाता है.

वृंदावनी गाय (सिंथेटिक)

वृंदावनी नस्ल को ICAR-IVRI, बरेली ने विकसित किया है. इसे एचएफ, हरियाणा, जर्सी और ब्राउन स्विस नस्लों के मिश्रण से तैयार किया गया है. इसका रंग मुख्य रूप से भूरा होता है और यह उत्तर प्रदेश के कई जिलों में पाली जाती है.

मेलघाटी भैंस

मेलघाटी भैंस महाराष्ट्र के अमरावती जिले के मेलघाट क्षेत्र में पाई जाती है. इसका रंग काला और बालदार होता है. चौड़ा माथा, लंबा चेहरा और उभरी हुई आंखें इसकी पहचान हैं.

पलामू बकरी

पलामू बकरी झारखंड के पलामू, लातेहार और गढ़वा जिलों में पाई जाती है. यह मीडियम साइज की होती है और मुख्य रूप से मीट उत्पादन के लिए पाली जाती है. इसका रंग गहरा भूरा या काला होता है और कान लटके हुए होते हैं.

उदयपुरी बकरी

उदयपुरी बकरी उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल क्षेत्र की मूल नस्ल है. यह मीडियम साइज की, कॉम्पैक्ट शरीर वाली और बालदार होती है. टैन रंग के शरीर पर ऊपरी हिस्से में काली धारियां इसकी खास पहचान हैं.

अविशान भेड़ (सिंथेटिक)

अविशान देश की पहली सिंथेटिक भेड़ नस्ल है, जिसे ICAR-CSWRI ने विकसित किया है. यह गारोल, मालपुरा और पाटनवाड़ी नस्लों के मिश्रण से बनी है. इसकी खासियत अधिक बच्चे देना और बेहतर दूध उत्पादन है. यह मटन टाइप की भेड़ मानी जाती है.

पशुपालकों के लिए क्यों अहम है यह कदम

नई नस्लों का पंजीकरण न सिर्फ देसी आनुवंशिक संसाधनों को संरक्षण देता है, बल्कि पशुपालकों को वैज्ञानिक तरीके से बेहतर नस्ल चुनने में भी मदद करता है. इससे उत्पादन बढ़ाने, स्थानीय नस्लों को पहचान दिलाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में बड़ा योगदान मिलेगा.

ये भी पढ़ें: हिमाचल प्रदेश में Farmer ID अनिवार्य

Exit mobile version