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खरीफ सीजन में नैनो डीएपी बना किसानों की पसंद, खेती की लागत घटाने और उत्पादन बढ़ाने में करेगा मदद

नई दिल्ली: जुलाई की शुरुआत के साथ ही देशभर के किसानों ने खरीफ सीजन की प्रमुख फसलों जैसे धान, सोयाबीन और मक्का की बुवाई तेज कर दी है। लेकिन रासायनिक उर्वरकों की बढ़ती कीमतें खेती की लागत को लगातार बढ़ा रही हैं। इस स्थिति में अब किसान पारंपरिक डीएपी के विकल्प के रूप में नैनो डीएपी को अपनाकर उत्पादन लागत को घटाने और फसल की गुणवत्ता बढ़ाने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। जबलपुर के कृषि उप संचालक डॉ. एस. के. निगम के मुताबिक, नैनो डीएपी की उपयोगिता और किफायती कीमत इसे किसानों के लिए एक प्रभावी विकल्प बनाती है। परंपरागत डीएपी खाद की एक बोरी की कीमत सब्सिडी के बाद लगभग 1350 रुपये होती है, जबकि नैनो डीएपी का आधा लीटर पैक मात्र 600 रुपये में उपलब्ध है। यानी एक किसान अगर नैनो डीएपी का इस्तेमाल करता है तो उसे प्रति बोरी लगभग 750 रुपये की सीधी बचत होती है। यह बचत बड़ी संख्या में किसानों के लिए एक आर्थिक राहत के रूप में सामने आ रही है। नैनो डीएपी न केवल बीज उपचार के लिए बल्कि फसलों की आवश्यक अवस्थाओं पर छिड़काव के लिए भी अत्यधिक प्रभावी है।

नैनो डीएपी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके सूक्ष्म कण पौधों के पत्तों, जड़ों, स्टोमेटा और बीज की सतह से सीधे प्रवेश कर जाते हैं। इसका असर तेजी से होता है और पौधों को बेहतर पोषण उपलब्ध कराता है। पारंपरिक डीएपी की तुलना में नैनो डीएपी की पोषक तत्व उपयोग दक्षता लगभग तीन गुना अधिक यानी 90 प्रतिशत तक होती है, जबकि दानेदार डीएपी में यह दर सिर्फ 30-40 प्रतिशत रहती है। यही कारण है कि इसके उपयोग से मिट्टी, पानी और वायु प्रदूषण की समस्या भी काफी हद तक कम हो जाती है। नैनो डीएपी में 8 प्रतिशत नाइट्रोजन और 16 प्रतिशत फॉस्फोरस मौजूद होता है, जो सभी प्रमुख फसलों के लिए आवश्यक पोषक तत्व हैं। यह बीजों के तेजी से अंकुरण, पौधों की बेहतर बढ़वार, अधिक फूल और फल, तथा अच्छी गुणवत्ता की उपज में सहायक होता है। किसानों के लिए इसकी सबसे बड़ी खासियत यह भी है कि इसका परिवहन और भंडारण भी आसान है, क्योंकि यह तरल रूप में आता है और कम मात्रा में भी प्रभावी होता है।

इसके प्रयोग की विधि भी सरल है। बीज उपचार के लिए प्रति किलो बीज पर पांच मिली नैनो डीएपी का उपयोग किया जाता है। इसे पानी में मिलाकर बीजों पर एकसमान घोल की परत बनानी होती है, जिसके बाद बीजों को छांव में सुखाकर बुवाई की जाती है। जड़ों या कंदों के लिए भी यही प्रक्रिया अपनाई जाती है। वहीं, फसल की विकास अवस्था में प्रति लीटर पानी में चार मिली नैनो डीएपी मिलाकर उसका छिड़काव किया जाता है। विशेषकर फसल की कल्ले और शाखा बनने की अवस्था, तथा फूल आने से पहले यह छिड़काव काफी उपयोगी माना जाता है।

राज्य सरकार और कृषि विभाग नैनो डीएपी को कृषि क्षेत्र में लागत घटाने और टिकाऊ खेती के साधन के रूप में बढ़ावा दे रहे हैं। किसानों को इसके बारे में प्रशिक्षण दिया जा रहा है और इसकी उपयोगिता पर जागरूक किया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान पारंपरिक डीएपी के स्थान पर नैनो डीएपी को बड़े पैमाने पर अपनाते हैं तो इससे खेती में न केवल आर्थिक लाभ होगा बल्कि पर्यावरण पर भी सकारात्मक असर पड़ेगा। खरीफ सीजन की शुरुआत में यह तकनीक किसानों के लिए उम्मीद की नई किरण बनकर सामने आई है। बेहतर उत्पादन, कम लागत और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी निभाने के लिहाज से नैनो डीएपी खेती को एक नई दिशा दे सकता है।

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