नई दिल्ली: भारत में इस वर्ष लगभग 87 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सरसों और रेपसीड की खेती हो रही है। सरसों से प्राप्त तेल घरेलू खपत का बड़ा आधार है। लेकिन दिसंबर के अंत से जनवरी के दौरान जब मौसम में नमी और बादल बने रहते हैं, तब माहू कीट तेजी से बढ़ता है। यह पौधों का रस चूसकर उन्हें कमजोर कर देता है। नतीजतन फूल झड़ जाते हैं, फलियां ठीक से विकसित नहीं हो पातीं और उत्पादन में भारी गिरावट आती है। यह कीट सरसों की फसल के लिए काफी खतरनाक है।
रसायनों पर निर्भरता से बढ़ रही चिंता
कई किसान माहू नियंत्रण के लिए महंगे रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग करते हैं। इससे कीट तो मर जाते हैं, लेकिन लागत बढ़ जाती है और फसल में जहरीले अवशेष रह जाते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह अवशेष मानव स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकते हैं और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का जोखिम बढ़ा सकते हैं। इसी कारण सुरक्षित और प्राकृतिक तरीकों को अपनाने पर जोर दिया जा रहा है।
स्टिकी ट्रैप से मिलेगी बड़ी राहत
स्टिकी ट्रैप माहू नियंत्रण का एक आसान और प्रभावी तरीका है। यह पीले रंग की शीट होती है, जिस पर चिपचिपा पदार्थ लगा रहता है। माहू कीट पीले रंग की ओर जल्दी आकर्षित होते हैं। जैसे ही वे ट्रैप पर बैठते हैं, गोंद में चिपक जाते हैं और नष्ट हो जाते हैं। इससे बिना किसी रसायन के फसल सुरक्षित रहती है।
घर पर ऐसे बनाएं स्टिकी ट्रैप
किसान बाजार से स्टिकी ट्रैप खरीद सकते हैं या घर पर भी बना सकते हैं। इसके लिए पीली पॉलीथीन, प्लास्टिक या टिन की शीट लें और उस पर अरंडी का तेल या पुराना मोबिल ऑयल लगा दें। एक एकड़ क्षेत्र के लिए 10 से 15 ट्रैप पर्याप्त होते हैं। इससे कीटनाशकों पर होने वाला खर्च काफी कम हो जाता है।
ट्रैप लगाने का सही तरीका
स्टिकी ट्रैप को सरसों के पौधों से 1 से 2 फीट ऊपर बांधना चाहिए। जब ट्रैप पर ज्यादा कीट चिपक जाएं तो 20 से 25 दिन बाद उसे बदल देना चाहिए। सही तरीके से लगाने पर माहू के साथ-साथ सफेद मक्खी जैसे अन्य कीटों पर भी नियंत्रण पाया जा सकता है।
स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए लाभकारी
विशेषज्ञों का मानना है कि स्टिकी ट्रैप जैसे उपाय मिट्टी, पानी और पर्यावरण को सुरक्षित रखते हैं। इससे किसानों को बेहतर पैदावार मिलती है और उपभोक्ताओं तक सुरक्षित व स्वच्छ खाद्य पदार्थ पहुंचते हैं।
कम खर्च में सुरक्षित खेती का रास्ता
सरसों की फसल को माहू से बचाने के लिए स्टिकी ट्रैप एक कम खर्चीला, सुरक्षित और प्रभावी विकल्प है। किसान अगर इस तकनीक को अपनाते हैं तो वे रसायनों पर निर्भरता घटाकर टिकाऊ खेती की दिशा में बड़ा कदम उठा सकते हैं।
ये भी पढ़ें: गेहूं की बालियों में कालापन बढ़ा, करनाल बंट रोग से भारी नुकसान का खतरा

