नई दिल्ली: देश में इस बार दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की शुरुआत कमजोर रही है, जिससे कई राज्यों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई है और इसका असर कृषि गतिविधियों पर साफ दिखाई देने लगा है। एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार 17 जून तक देश में कुल 46.2 मिलीमीटर बारिश हुई, जबकि सामान्य स्तर 74.3 मिलीमीटर होना चाहिए था। यानी इस अवधि में लगभग 38 प्रतिशत कम वर्षा हुई है, वहीं 17 जून को समाप्त सप्ताह में यह कमी करीब 48 प्रतिशत तक पहुंच गई।
कई राज्यों में बारिश की भारी कमी
मॉनसून की धीमी रफ्तार का असर देश के अधिकांश हिस्सों में देखा जा रहा है। आंकड़ों के अनुसार देश के 36 मौसम उपमंडलों में से 22 में सामान्य से कम वर्षा हुई है। जिला स्तर पर भी करीब 66 प्रतिशत क्षेत्रों में बारिश की कमी दर्ज की गई है। मध्य भारत में स्थिति सबसे अधिक गंभीर रही, जहां लगभग 62 प्रतिशत कम बारिश हुई, जबकि पूर्वी भारत में यह कमी करीब 44 प्रतिशत रही।
खरीफ बुवाई में आई गिरावट
कम वर्षा का सीधा असर खरीफ फसलों की बुवाई पर पड़ा है। 12 जून तक कुल बुवाई क्षेत्र 84.6 लाख हेक्टेयर रहा, जो पिछले वर्ष की तुलना में 3.9 प्रतिशत कम है। दलहन और कपास की बुवाई में सबसे अधिक गिरावट दर्ज की गई है। दलहन की बुवाई में करीब 43.2 प्रतिशत और कपास में लगभग 28 प्रतिशत की कमी आई है। हालांकि धान की बुवाई में वृद्धि देखी गई है, जो पिछले वर्ष के मुकाबले 28.4 प्रतिशत अधिक रही है।
जलाशयों में पानी से मिली राहत
कम बारिश के बावजूद जलाशयों में पानी का स्तर फिलहाल संतोषजनक बना हुआ है। 11 जून तक जलाशयों में कुल क्षमता का 28.3 प्रतिशत पानी उपलब्ध था, जो पिछले दस वर्षों के औसत से लगभग 16 प्रतिशत अधिक है। इससे सिंचाई के लिए किसानों को कुछ राहत मिलने की उम्मीद बनी हुई है।
जुलाई-अगस्त की बारिश पर टिकी उम्मीद
विशेषज्ञों का मानना है कि मॉनसून की शुरुआती कमजोरी के बावजूद पूरे मौसम का प्रभाव जुलाई और अगस्त की वर्षा पर निर्भर करेगा। यही वह समय होता है जब सबसे अधिक वर्षा होती है और खेती के लिए यह अवधि अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। यदि आने वाले समय में वर्षा सामान्य होती है तो फसलों की स्थिति में सुधार हो सकता है, लेकिन यदि कमी बनी रहती है तो इसका असर उत्पादन, किसानों की आय और खाद्य कीमतों पर पड़ सकता है।
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