नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने सभी राज्यों द्वारा प्रस्तुत गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) प्रस्ताव को खारिज कर दिया है, जिसमें महाराष्ट्र सरकार ने गेहूं के लिए कुल 4,461 रुपये प्रति क्विंटल MSP की मांग की थी। केंद्र ने रबी विपणन सत्र 2025–26 के लिए देशव्यापी MSP 2,425 रुपये क्विंटल तय किया है, जिस पर राज्यों के विशेष पूर्वानुमान को ध्यान में रखे बिना औसत लागत विधि अपनाई गई।
महाराष्ट्र के अलावा, गुजरात ने 4,050 रुपये और पश्चिम बंगाल ने 3,350 रुपये प्रति क्विंटल MSP लगाने की मांग की थी, मगर सभी राज्यों की मांगों को खारिज कर दिया गया। केंद्र ने गेहूं की प्रति क्विंटल A2+FL लागत को 1,182 रुपये माना और उस पर 105% लाभ की दर से MSP 2,425 रुपये तय किया।
केंद्र सरकार के अनुसार गेहूं की संपूर्ण लागत (C2) 1,720 रुपये प्रति क्विंटल है, लेकिन A2+FL विधि को आधार मानकर MSP तय किया गया। ऐसे औसत गणनाओं से बड़े राज्यों के किसानों को लाभ मिलना मुश्किल हो रहा है, क्योंकि उनके उत्पादन खर्च में क्षेत्रीय अंतर बहुत अधिक है।
यद्यपि राज्य सरकारें MSP के ऊपर बोनस प्रदान कर सकती हैं, लेकिन केंद्र द्वारा इस प्रक्रिया को ठीक नहीं माना गया है। उदाहरण के लिए, रबी 2024-25 में केंद्र ने गेहूं का MSP 2,275 रुपये तय किया था और कुछ राज्य चुनावी वादे के तहत अतिरिक्त 125-425 रुपये बोनस देने का प्रयास करने पर भी पीछे हट गए।
धान के मामले में भी राज्य और केंद्र के बीच तनाव देखा गया है। केंद्र ने खरीफ 2024-25 के लिए धान का MSP 2,300 रुपये प्रति क्विंटल तय किया, जबकि महाराष्ट्र ने 4,661 रुपये, केरल ने 3,690 रुपये और कर्नाटक ने 3,426 रुपये की मांग की थी।
उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और छत्तीसगढ़ में से चार ने गेहूं के MSP के लिए कोई प्रस्ताव नहीं भेजा, जिसमें सबसे बड़ा उत्पादक उत्तर प्रदेश भी शामिल है। केंद्र द्वारा एकल MSP तय करना राज्यों की कृषि लागत में विविधता को अनदेखा करने जैसा है, जिससे बड़े और छोटे किसानों में असंतोष बढ़ता जा रहा है। राज्यों का तर्क है कि क्षेत्रीय विविधता के चलते MSP एक औसत मान से तय नहीं होना चाहिए। दूसरी ओर, केंद्र महंगाई को आधार मानकर MSP पर कटौती कर रहा है।
राज्यों के MSP प्रस्ताव खारिज हो जाने के बाद केंद्र सरकार ने पूरे देश के लिए एक सममूल्य MSP अपनाया है, जिससे राज्य विशेष बोनस देने तक सीमित रह गए हैं। इस निर्णय से किसानों की लागत और लाभ में खाई बढ़ सकती है और क्षेत्रीय असंतुलन गहरा सकता है। आगे सरकार और किसान संघों के बीच इस मसले पर और बहस और संभवत: विरोध-प्रदर्शनों की संभावना बनी हुई है।

