भोपाल: मध्य प्रदेश में ग्रीष्मकालीन मूंग की सरकारी खरीद को लेकर किसानों और सरकार के बीच विवाद अब बड़े आंदोलन का रूप ले चुका है। न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सीमित खरीद के फैसले से नाराज किसान 6 जुलाई को प्रदेशभर में प्रदर्शन कर रहे हैं। किसान संगठनों का कहना है कि सरकार को मूंग की पूरी उपज न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदनी चाहिए। वहीं प्रशासन की नजर आंदोलन की स्थिति पर बनी हुई है।
सीमित खरीद नीति को लेकर बढ़ा विवाद
विवाद की शुरुआत तब हुई जब राज्य सरकार ने ग्रीष्मकालीन मूंग की कुल उपज का केवल 25 प्रतिशत हिस्सा न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदने का निर्णय लिया। किसानों के विरोध के बाद इस सीमा को बढ़ाकर 40 प्रतिशत कर दिया गया, लेकिन किसान संगठनों का कहना है कि यह फैसला उनकी समस्याओं का समाधान नहीं है। किसानों का तर्क है कि जब सरकार ने उन्हें मूंग की खेती के लिए प्रोत्साहित किया, तो पूरी उपज की खरीद भी सुनिश्चित की जानी चाहिए। उनका कहना है कि शेष उपज को खुले बाजार में कम कीमत पर बेचने से उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।
भैरुंदा और हरदा बने आंदोलन के प्रमुख केंद्र
सोमवार को सीहोर जिले के भैरुंदा और हरदा जिले में आंदोलन का सबसे अधिक असर देखने को मिल रहा है। भैरुंदा में कृषि उपज मंडी से बड़ी ट्रैक्टर रैली निकाली जा रही है। किसान संगठनों का दावा है कि इसमें हजारों किसान और बड़ी संख्या में ट्रैक्टर-ट्रॉलियां शामिल हो रही हैं। आंदोलन में शामिल किसान लंबे समय तक धरना देने की तैयारी के साथ आवश्यक दैनिक उपयोग का सामान भी लेकर पहुंचे हैं। इससे संकेत मिल रहे हैं कि मांगें पूरी होने तक आंदोलन जारी रह सकता है। वहीं हरदा में रेल मार्ग पर प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन को देखते हुए प्रशासन सतर्क है और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की गई है।
ई-टोकन व्यवस्था पर भी किसानों की नाराजगी
सरकारी खरीद प्रक्रिया में लागू ई-टोकन व्यवस्था भी किसानों के असंतोष का बड़ा कारण बन गई है। किसानों का आरोप है कि पोर्टल पर समय पर स्लॉट उपलब्ध नहीं होते, कई केंद्रों पर क्षमता समाप्त होने का संदेश दिखाई देता है और लंबे समय तक प्रयास करने के बावजूद टोकन नहीं मिल पाता। किसान संगठन इस व्यवस्था को सरल और अधिक प्रभावी बनाने की मांग कर रहे हैं ताकि सभी पात्र किसानों को आसानी से सरकारी खरीद का लाभ मिल सके।
केवल मूंग खरीद नहीं, कई अन्य मांगें भी शामिल
किसान संगठनों का कहना है कि यह आंदोलन केवल मूंग की सरकारी खरीद तक सीमित नहीं है। इसके साथ कई अन्य कृषि संबंधी मुद्दों को भी प्रमुखता से उठाया जा रहा है। किसान भूमि अधिग्रहण पर उचित मुआवजे, समय पर उर्वरकों की उपलब्धता, सिंचाई परियोजनाओं को शीघ्र पूरा करने तथा खरीफ मौसम में मक्का और सोयाबीन जैसी फसलों की न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद नीति पहले से स्पष्ट करने की मांग कर रहे हैं।
सरकार के सामने बढ़ी चुनौती
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि सरकार और किसान संगठनों के बीच समय रहते सकारात्मक संवाद नहीं हुआ तो आंदोलन का दायरा और बढ़ सकता है। इसका असर कृषि मंडियों में व्यापार और सरकारी खरीद व्यवस्था पर भी पड़ने की आशंका जताई जा रही है। फिलहाल सरकार और प्रशासन की नजर आंदोलन की स्थिति पर बनी हुई है। आने वाले दिनों में सरकार और किसान संगठनों के बीच होने वाली बातचीत से ही यह तय होगा कि विवाद का समाधान किस दिशा में आगे बढ़ता है।
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