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लौकी की पैदावार में इन वजहों से आती है कमी, अच्छी उपज के लिए अपनाएँ ये उपाय

नई दिल्ली: कददूवर्गीय सब्जियों में लौकी का एक प्रमुख स्थान है। इस सब्जी की खेती के लिए गर्म व आर्द्र जलवायु उपयुक्त होती है। लौकी पाले को सहन करने में बिलकुल असमर्थ होती है। इस फसल पर भी अक्सर विभिन्न रोगों व कीटों का आक्रमण होता रहता है, जिनपर यदि समय रहते नियंत्रण न किया जाए तो पैदावार में भारी कमी देखने को मिलती है।

लाल कीड़ा या रेड पम्पकिन बीटल लौकी की फसल पर आक्रमण करने वाला एक प्रमुख कीट है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है इस कीट का रंग लाल होता है। हालांकि इस कीट की दूसरी जाति का प्रौढ़ काले रंग का भी होता है। इस कीट का प्रकोप पौधों में दो पत्तियां निकलने पर शुरू हो जाता है। यह कीट पत्तियों एवं फूलों को खाता है तथा इस कीट की सूंडी भूमि के अंदर पौधों की जड़ों को काटती है। इसकी रोकथाम के लिए अच्छे से निड़ाई-गुड़ाई कर खेत को साफ रखें। फसल कटाई के बाद खेतों की गहरी जुताई करें ताकि जमीन में छिपे हुए कीट व उनके अण्डे ऊपर आकर सूर्य की गर्मी या चिड़ियों के द्वारा नष्ट हो जाएँ। रासायनिक उपचार के तौर पर आप कार्बोफ्यूरान 3 प्रतिशत दानेदार 7 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के हिसाब के पौधे के आधार के पास मिट्टी के 3 से 4 सेमी. अंदर डाल सकते हैं। इसके बाद पौधों की जड़ों के पास पानी डालें ताकि कीटनाशक मिट्टी के अंदर जड़ों तक पहुँच सके।

लौकी की फसल को एक और कीट काफी नुकसान पहुंचाता है, इसका नाम है – फल मक्खी या फ्रूट फ्लाई। इस कीट का प्रौढ़ घरेलू मक्खी के बराबर लाल-भूरे या पीले-भूरे रंग का होता है। इसके सिर पर काले या सफेद धब्बे बने होते हैं। इसकी मादा कीट लौकी के फलों मे छेद करके छिलके के भीतर अण्डे देती है। फिर उन अण्डों से इल्लियां निकलती है और फलों के गूदे को खा जाती है। इस वजह से लौकी का फल सड़ने लगता है। इस कीट की रोकथाम के लिए क्षतिग्रस्त तथा नीचे गिरे हुए फलों को नष्ट कर देना चाहिए। सब्जियों के जो फल भूमी पर बढ़ रहे हों, उन्हें समय-समय पर पलटते रहना चाहिए। इसके अलावा आप 50 मिलीलीटर मैलाथियान 50 ई.सी. व 500 ग्राम शीरा या गुड़ को 50 लीटर पानी में घोलकर फसल पर छिड़काव करें। इस प्रक्रिया की एक सप्ताह बाद पुनरावृति करें। ऐसा करने से फल मक्खी के प्रकोप में कमी आएगी।

उपरोक्त कीटों के अलावा चुर्णी फफूंदी; लौकी का एक ऐसा रोग है, जिसकी वजह से लौकी की पैदावार काफी घट जाती है। यह रोग फफूंद के कारण होता है। इसकी वजह से लौकी की पत्तियों और तने पर सफेद दाग और गोलाकार जाल सा दिखाई देता है, जो बाद मे काफी बढ़ जाता है और कत्थई रंग का हो जाता हैं। इसकी वजह से लौकी की पूरी पत्तियां पीली पड़कर सूख जाती हैं। इस वजह से पौधों की बढ़वार रूक जाती है। इस रोग की रोकथाम के लिए रोगी पौधे को उखाड़ कर जला देना ही बेहतर होता है। इसके अलावा इस रोग के प्रारंभिक लक्षण दिखते ही 10‐15 दिनों के अंतराल पर कवकनाशी दवाइयों का उपयोग करना चाहिए। इससे फफूंद के प्रकोप में कमी आती है।

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